Thursday, February 29, 2024

व्यंग्य - डिजिटल एनीमल

व्यंग्य _ 'डिजिटल एनीमल' .......................... इंसान के बारे में कहा जाता है कि वह सामाजिक प्राणी है। आप मानें या माने पर आज के इंसान को सामाजिक प्राणी की जगह 'डिजिटल एनीमल' कहना ज्यादा उचित लग रहा है। अब इंसान को इंसान के साथ अच्छा नहीं लगता, इंसान का दिमाग विचित्र होता जा रहा है,हर कोई अपने मूड और मस्ती में रहना चाहता है।कान में आइपोड या प्लग्स लगाकर बैठे व्यक्ति से कुछ कहो तो वह चिढ़ जाता है, फिर आज के इंसान को कैसे कहें कि वह सामाजिक प्राणी है। सभी के दोनों हाथों में मोबाइल है, मोबाइल के अलावा लेपटॉप या टेबलेट जैसा दूसरा कोई न कोई डिजिटल इंस्ट्रूमेंट भी साथ है, यार भाई... तू तो सामाजिक प्राणी है फिर एक घंटे मोबाइल से अलग रहने की बात से इतना तू अपसेट क्यूं होता है, यदि बैटरी लो हो रही हो तो तू डाउन क्यूं हो जाता है।आठ दस घंटे मोबाइल के चक्कर में तू असामाजिक होने जैसी हरकतें क्यूं करने लगता है।तू तो अपने आपको सामाजिक प्राणी कहता है फिर तुझे मोबाइल में वह अमुक चेहरा क्यूं अच्छा लगने लगता है जिससे तू मिला भी नहीं है जिसे तू पहचानता भी नहीं है, फिर क्यूं दिनों रात उसी के बारे में सोचता रहता है, तेरे दिल दिमाग में वो अमुक हीरोइन छायी रहती है, ऐसा लगता है जैसे वो तुम्हारे साथ रहती है। यार भाई...तू जाग तू तो सामाजिक प्राणी है तो तू हमेशा ख्यालों में क्यूं जीने लगा, ऐसा लग रहा है कि तूने अपनी लवस्टोरी में अपने साथ एक वर्चुअल पार्टनर के संग जी रहा है, फेसबुक, वाट्स अप, इंस्टाग्राम में तुम्हारा प्यार और संबंध डिजिटल हो गए हैं, तुझे प्यार जैसा कुछ होता तो है पर वह लम्बे समय टिकता नहीं, ब्रेकअप के मामले में तू तो ज्यादा सामाजिक हो गया है। प्राइवेसी का नाम तू और तेरा मोबाइल हो गया है, दिखावे की दुनिया का तू सरताज हो गया है। याद है जब माता-पिता ने तेरा जबरदस्ती विवाह किया था तो बारात बिदा होते ही कार में बैठे बैठे तू तुरंत नवपरिणीत युगल स्टेट्स अपलोड करने में लग गया था, फूफा और जीजा की तरफ तो देखा भी नहीं था, फूफा बहुत नाराज हो गए थे तो तुम्हारे माता-पिता उनके चरणों में लोट गये थे पर तुम अपलोड करने और रील बनाने में बिजी हो गए थे,सब बाराती हंस रहे थे और तू नयी पत्नी से कह रहा था कि जब मैं मोबाइल में होऊं तो मुझे डिस्टर्ब नहीं करना, मैं क्या देख रहा हूं...क्या कर रहा हूं इस बारे में कभी कोई सवाल नही करना क्योंकि मेरे पांच हजार फ्रेंड हैं, हालांकि वे जब सामने मिलेंगे तो भले न हम पहचाने पर वे डिजिटल फ्रेंड की श्रेणी में तो आते हैं, यही फ्रेंड हमें दिन-रात लाइक और कमेंट देते हैं, ये हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं,नात- रिश्तेदार तो स्वार्थवश जुड़े होते हैं हमारी पोस्ट देखकर भी अनजान बन जाते हैं,आज के युग में नात रिश्तेदार सब असामाजिक प्राणी हो गए हैं पर लाइक और कमेंट देने वाले सच में सामाजिक प्राणी कहलाने लायक होते हैं। तुम्हें याद है शादी के दूसरे दिन तुम्हारा हनीमून था तो उस रात आकाश में पूरा मून तो निकला था पर उस रात को भी तुमने डिजिटल हनीमून मनाने का फैसला कर लिया था, और वह बेचारी रात भर तड़फती रह गई थी... ------------------------------ जय प्रकाश पाण्डेय

कहां गए वे लोग

"कहां गए वे लोग" .................... राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' (24.10.38- 27.02.24) ------------------------------------ स्वयं की यश-कीर्ति बढ़ाने, स्वयं को स्थापित करने, पुरस्कार-सम्मान प्राप्त करने के प्रयत्न में तो सभी लगे रहते हैं किंतु अपने मित्रों को, आने वाली पीढ़ी को निःस्वार्थ प्रोत्साहित करने, उनके कार्य में सुधार करने, उनको उचित मार्गदर्शन देने के लिए अपना समय और शक्ति खर्च करने वाले लोग बिरले ही होते हैं । वरिष्ठ शिक्षाविद्, पत्रकार, साहित्यकार डॉ.राजकुमार तिवारी "सुमित्र" ऐसे ही बिरले लोगों में से एक थे। डॉ."सुमित्र" ने श्रम और साधना से न सिर्फ स्वयं "सिद्धि" प्राप्त की वरन प्रेरणा और मार्गदर्शन देकर न जाने कितने लोगों को गद्य-पद्य लेखन में पारंगत कर प्रसिद्धि के शिखर तक पहुंचाया । मुझे याद है जब मैं कक्षा दसवीं का छात्र था तब एक कविता लिखकर उसे प्रकाशित कराने नवीन दुनिया प्रेस गया था । "सुमित्र जी" ने मेरी कविता प्रकाशित कर मुझे और और लिखने की प्रेरणा दी थी । 50 वर्ष पूर्व "सुमित्र जी" से वह मेरा पहला परिचय था । उन दिनों और उसके बाद भी सुमित्र जी के पास पहुँच कर उनका समय बर्बाद करने वाला मैं अकेला नहीं था, मुझ जैसे अनेक लोग थे, किन्तु सुमित्र जी सबसे बहुत आत्मीयता से मिलते उन्हें पर्याप्त समय देते । मुझे लगता है कि यदि सुमित्र जी स्वार्थी होते, उन्होंने नई पीढ़ी को प्रोत्साहित करने में अपने जीवन का कीमती समय खर्च न करके उसका उपयोग सिर्फ स्वयं के लिए किया होता तो शायद उन्होंने लिखने-पढ़ने का जितना काम अब तक किया है उससे कहीं दस गुना ज्यादा कर लिया होता, किन्तु वे ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि वे "सुमित्र" हैं और अगर उन्होंने ऐसा किया होता तो सम्भवतः इतनी संख्या में पढ़ने-लिखने वाले लोग तैयार न होते । साहित्यकारों की नई पीढ़ी तैयार करने में जितना योगदान सुमित्र जी का है उतना उनके समकालीन साहित्यकारों में शायद ही किसी का हो । हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, पत्रकारिता एवं शिक्षण में पत्रोपाधि प्राप्त करके सुमित्र जी ने पी.एच डी. की उपाधि प्राप्त की । डॉ सुमित्र जी ने अपना जीवन स्कूल शिक्षक के रूप में प्रारम्भ किया फिर खालसा कॉलेज में अध्यापन किया । उन्होंने दैनिक नवीन दुनिया में संपादन कार्य कर पत्रकारिता में यश-कीर्ति प्राप्त की । वे दैनिक जयलोक के सलाहकार संपादक थे, पत्रिका "सनाढ्य संगम" के परामर्शदाता थे । उन्होंने अपने संपादन से अनेक पुस्तकों-स्मारिकाओं को स्मरणीय-संग्रहणीय बना दिया । वे शासन द्वारा अधिमान्य वरिष्ठ पत्रकार माने जाते थे। डॉ.सुमित्र ने अनेक छात्र-छात्राओं को शोध कार्य हेतु सहयोग एवं परामर्श प्रदान किया । इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त वि वि के अकादमिक सलाहकार एवं कोयला व खान मंत्रालय हिंदी सलाहकार समिति तथा आकाशवाणी सलाहकार समिति के पूर्व सदस्य डॉ. राजकुमार तिवारी "सुमित्र" साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था "मित्रसंघ" के संस्थापक सदस्य भी रहे हैं उनके अध्यक्षीय कार्यकाल में मित्रसंघ ने बहुत यश कमाया था । देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में डॉ.सुमित्र की सैकड़ों गद्य-पद्य रचनाएं प्रकाशित हुई हैं । उनकी रचनाओं, आलेखों, रेडियो रूपकों का प्रसारण आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से जब-तब होता रहता था । डॉ. सुमित्र की संभावनाओं की फसल, यादों के नागपाश (काव्य संकलन), बढ़त जात उजियारो (बुन्देली काव्य), खूंटे से बंधी गाय-गाय से बंधी स्त्री (व्यंग्य संग्रह) सहित काव्य, कथा, चिंतन परक गद्य निबंध, रेडियो रूपक, व्यंग्य एवं उपन्यास सहित 40 से अधिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं । भारत भारती, श्रेष्ठ गीतकार एवं शंकराचार्य पत्रकारिता पुरस्कार से सम्मानित-अलंकृत डॉ.सुमित्र को श्रेष्ठ साहित्य सृजन पर साहित्य दिवाकर, साहित्य मनीषी, साहित्य श्री, साहित्य भूषण, साहित्य महोपाध्याय, पत्रकार प्रवर, विद्यासागर (डी.लिट्.), व्याख्यान विशारद, हिंदी रत्न, साहित्य प्रवीण, साहित्य शिरोमणि, साहित्य सुधाकर आदि सम्मान/ उपाधियां प्राप्त हो चुकी हैं । सुमित्र जी ने साहित्य समारोहों में शामिल होने न्यूयार्क (अमेरिका), इंग्लैंड, रूस आदि देशों की यात्राएं कीं थीं और सम्मानित होकर नगर का गौरव बढ़ाया । अनेक पत्र-पत्रिकाओं ने डॉ. सुमित्र के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आलेख प्रकाशित किये गये हैं। देश के अनेक छोटे-बड़े नगरों में उन्हें सम्मानित-अलंकृत किया गया था । वे पाथेय संस्था और पाथेय प्रकाशन के संस्थापक-निदेशक रहे हैं । उल्लेखनीय है कि पाथेय द्वारा अब तक स्थानीय एवं देश-प्रदेश के साहित्यकारों की 700 से अधिक कृतियों का प्रकाशन किया जा चुका है जो एक कीर्तिमान है । डॉ.राजकुमार तिवारी "सुमित्र" जी की धर्म पत्नी स्मृति शेष डॉ.गायत्री तिवारी समर्पित शिक्षिका और श्रेष्ठ कथाकार थीं । उनके सुपुत्र डॉ. हर्ष तिवारी अपने यू ट्यूब चैनल "डायनेमिक संवाद" के माध्यम से साहित्य, कला, संस्कृति और सेवा में रत लोगों को प्रभावशाली ढंग से समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं । अपने सदव्यवहार, आशीष वचनों, शुभकामनाओं और सहयोग से लोगों के ह्रदय में बसने वाले डॉ. राजकुमार तिवारी "सुमित्र" जी हम सबको छोड़कर 27 फरवरी को अनंत यात्रा की तरफ चले गए। ईश्वर अपने चरणों में उनको स्थान दे। विनम्र श्रद्धांजलि.... ................................ (साभार - प्रतुल श्रीवास्तव)

कहां गए वे लोग

कहां गए वे लोग __ "पंडित भवानी प्रसाद तिवारी" ................................... (सौम्य, गरिमामय व्यक्तित्व के धनी, प्रखर कवि लेखक व संपादक) कवि, पत्रकार और राजनेता के रूप में समान लोकप्रियता के धनी पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जनसभाओं में प्रतिष्ठित राजनेताओं और साहित्यकारों के बीच में से श्रोताओं की सहज श्रद्धा और लोकप्रियता के एक मात्र पात्र बनने की सामर्थ्य रखते थे।सात बार जबलपुर नगर निगम के महापौर चुने गए थे, लम्बे समय राज्यसभा सांसद रहे। वे 'प्रहरी' पत्रिका के ऐसे सफल सम्पादक थे जिन्होंने देश को समर्थ और लोकप्रिय हरिशंकर परसाई जैसा व्यंग्यकार दिया, परसाई जी की पहली रचना और पहला कालम 'नर्मदा के तट से' प्रहरी से ही प्रारंभ हुआ। कवि के रूप में आदरणीय तिवारी जी जन जन के बीच लोकप्रिय थे। राजनीति और साहित्य के पारस्परिक संबंधों के बारे में उनका कहना था... "जब राजनीति पथभ्रष्ट होती है तब साहित्य विद्रोही हो जाता है" 1942 के जन आंदोलन के समय पंडित भवानी प्रसाद तिवारी जी जबलपुर नगर कांग्रेस के अध्यक्ष थे, और पूरे देश में यह अकेला शहर था जहां सेना के जवान अपनी बैरकों से बाहर आ गए थे,यह तिवारी जी के समर्थ नेतृत्व का ही परिणाम था कि 1942 में जबलपुर का अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन समूचे महाकौशल में जन जाग्रति का वाहक बनकर फैला। सन् 1942 में गिरफ्तार हो उन्हें जेल यात्रा करनी पड़ी,जेल में भी उनका समय व्यर्थ नहीं गया यहीं उन्होंने रवीन्द्र नाथ टैगोर की 'गीतांजलि' का अध्ययन मनन किया और गीतांजलि का अनु -गायन जैसा उनके द्वारा संभव हुआ।आज भी हिन्दी में प्रकाशित कोई भी अनुवाद उसके समक्ष बेसुरा प्रतीत होता है, गीतांजलि अनु गायन के प्रकाशित होते ही उनकी यश-कीर्ति नगर और राज्य की सीमा लांघकर सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य में फैली... 'दिखते हैं प्रभु कहीं, यहां नहीं यहां नहीं, फिर कहां? अरे वहां, जहां कि वह किसान दीन,वसनहीन तन मलीन, जोतता कड़ी जमीन, प्रभु वहीं कि जहां पर वह मजूर करता है चोटों से पत्थर को चूर' 'प्राण पूजा' और 'प्राण धारा' उनके मूल कविता संग्रह प्रकाशित हुए थे,'तुम कहां चले गए' शोक कविताओं का लघु संग्रह है, 'जब यादें उभर आतीं हैं' उनके संस्मरणात्मक वैयक्तिक निबंधों का संग्रह है, 'गांधी जी की कहानी' गांधी के महान व्यक्तित्व को सरल भाषा में किशोरोपयोगी बनाने का प्रयास था। कथा वार्ता उनकी कथात्मक एवं समीक्षात्मक रचनाओं का संग्रह है। श्री तिवारी जी की 'प्रहरी' पत्रिका में प्रकाशित 'हाथों के मुख से' और 'संजय के पत्र' , 'हमारी तुमसे और तुम्हारी हमसे' जैसे स्तंभों में छपी सेंकड़ों पृष्ठों की सामग्री हिंदी साहित्य के क्षेत्र में रचनात्मक योगदान के रूप में याद रखी जाएगी। एक पूरी की पूरी साहित्यिक पीढ़ी जिसमें सर्वश्री केशव पाठक, रामानुज लाल श्रीवास्तव, सुभद्रा कुमारी चौहान, नर्मदा प्रसाद खरे, हरिशंकर परसाई, रामेश्वर गुरू, जैसे महान साहित्यकार उनकी प्रहरी पत्रिका में प्रकाशित हुए। राजनेता और पत्रकार से भिन्न उनका साहित्यिक व्यक्तित्व सर्वोपरि था जो उनके इन दोनों रूपों को सहज ही आच्छादित किए रहता था, और मंच से बोलते हुए तिवारी जी के भाषण और भंगिमा में इस व्यक्तित्व का इतना अधिक प्रभाव रहता था कि उनके साहित्यिक श्रोताओं को तिवारी जी की काव्य पंक्तियां याद आने लगतीं थीं। लोग बताते हैं कि होली जैसे जन पर्व के अवसर पर या शरद पूर्णिमा के कवि सम्मेलन में उनकी मधुर संवेदनशील वाणी सहज ही गूंज जाती थी.... 'फूल ने पांवड़े बिछाए हैं, कौन ये मेहमान आये हैं ' ---------------------------------- जय प्रकाश पाण्डेय

कहां गए वे लोग

विनम्र निवेदन __ डिजिटल प्लेटफार्म में 'ई-अभिव्यक्ति' पत्रिका का मान है, हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी के लाखों पाठक इसे पढ़ते हैं, पसंद करते हैं। हमारे आसपास की ऐसी वे महान हस्तियां जिन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी हिस्सेदारी की, या साहित्य के क्षेत्र में अविस्मरणीय काम किया,या समाज सेवा के अलावा किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया था और वे आज इस दुनिया में नहीं हैं, ऐसे महान लोगों की याद को ताजा करने के लिए हमने 'ई-अभिव्यक्ति' में एक ऐतिहासिक श्रृंखला "कहां गए वे लोग" चालू की गई है। श्रृंखला की शुरुआत पंडित भवानी प्रसाद तिवारी से हुई है।आपसे अनुरोध है कि अपने क्षेत्र की ऐसी महान हस्तियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर या स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिका पर या मानव कल्याण हेतु किए गए उनके उल्लेखनीय कार्यों के विवरण लिखकर उनकी एक फोटो के साथ हमें वाट्स अप नंबर 9977318765 पर भेजें,साथ में अपना परिचय और फोटो भी भेजिए, ताकि हम इस ऐतिहासिक श्रृंखला में प्रकाशित कर सकें। *विनम्र -जय प्रकाश पाण्डेय सम्पादक (9977318765) 'ई-अभिव्यक्ति'