Sunday, March 28, 2010

'' कविता इसलिए ''

इस कविता में सूरज इसलिए ,
ताकि ' सुबह ' का एहसास रहे ,
इस कविता में ख्वाब इसलिए ,
ताकि उम्मीद का सिलसिला बने ,
इस कविता में 'याद' इसलिए ,
ताकि जीवन में रोमांच मिले ,
इस कविता में ' आग ' इसलिए ,
ताकि सबको परम सुख मिले ,
इस कविता में 'आवाज ' इसलिए ,
ताकि जागते रहो की मुनादी मिले ,
इस कविता में संतोष इसलिए ,
ताकि सबको भरपूर सुख मिले ,
इस कविता में सिटिजन इसलिए ,
ताकि सच्चे अच्छे को अधिकार मिले ,
इस कविता में ''ओबामा ''इसलिए ,
ताकि 'परिवर्तन ' की याद रहे ,

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--जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

Saturday, March 27, 2010

'' सवालों के तूफान ''

चार माह पहले झाबुआ से वापस लोटते समय धार के पास आगे -आगे भाग रहे ट्रक के पीछे लिखा था ,
'' कृष्ण करें तो खेल ,
हम करें तो जेल ,''

ट्रक पर लिखे इन शब्दों की पीड़ा को लाखों ने झेला होगा /झेल रहे होंगे , पर अब चिंता की बात नहीं ....
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फेसले ''लिव इन रिलेशनशिप '' में ट्रक में लिखे शब्दों की पीड़ा में सबको राहत
दे दी है , अब ' कृष्ण और हम सब'' एक हो गए है ,

-जय प्रकाश पाण्डेय

'' पहल -सिटिजनशिप ''

जीवन है चलने का नाम ..... जो लोंग परेशानी भरी जिंदिगी जीते है उनकी संवेदनाये मरती नहीं है , उनकी संवेदना विपरीत परिस्थतियों से लड़ने की प्रेरणा देती है और वे अन्य के लिए भी प्रेरक बन जाते है , उनकी सहज सरल बातें भी ख़ुशी का पैगाम बनकर उस माहौल में संवेदना , सेवा और सामाजिकता पैदा कर देती है , नारायणगंज शाखा में दूर - अंचल से खाता खोलने आये ''रंगेया'' ने भी कुछ ऐसी छाप छोडी ........
''रंगेया '' जब खाता खोलने आया तो बेंकवाले ने पूछा - ''रंगेया '' खाता क्यों खुलवा रहे हो ?
''रंगेया '' ने बताया - साब दस कोस दूर बियाबान जंगल के बीच हमरो गाँव है घास -फूस की टपरिया और घरमे दो-दो बछिया ....घर की परछी में एक रात परिवार के साथ सो रहे थे तो कालो नाग आके घरवाली को डस लियो , रात भर तड़फ -तडफ कर बेचारी रुकमनी मर गई ...... मरते दम तक भुखी प्यासी दोनों बेटियों की चिंता करती रही ........ सांप के काटने से घरवाली मरी तो सरकार ने ये पचास हजार रूपये का चेक दिया है , तह्सीलवाला बाबु बोलो कि बैंक में खाता खोलकर चेक जमा कर देना रूपये मिल जायेगे ..... सो खाता की जरूरत आन पडी साब ! .... बैंक वाले ने पूछा - सांप ने काटा तो शहर ले जाकर इलाज क्यों नहीं कराया ?
''रंगेया '' बोला - कहाँ साब !'' गरीबी में आटा गीला ''.... शहर के डॉक्टर तो गरीब की गरीबी से भी सौदा कर लेते है ,वो तो भला हो सांप का ... कि उसने हमारी गरीबी की परवाह की और रुकमनी पर दया करके चुपके से काट दियो , तभी तो जे पचास हजार मिले है खाता न खुलेगा ...... तो जे भी गए ............ अब जे पचास हजार मिले है तो कम से कम हमारी गरीबी तो दूर हो जायेगी , दोनों बेटियों की शादी हो जयेहे और घर को छप्पर भी सुधर जाहे ,जे पचास हजार में से तहसील के बाबु को भी पांच हजार देने है बेचारे ने इसी शर्त पर जे चेक दियो है । तभी किसी ने कहा -यदि नहीं दो तो ?........... रंगेया तुरंत बोला - नहीं साब ...... हम गरीब लोंग है ''प्राण जाय पर वचन न जाही '' ...साब , यदि नहीं दूगा तो मुझे पाप लगेगा , उस से वायदा किया हूँ झूठा साबित हो जाऊँगा ....अपने आप की नजर में गिर जाऊँगा .....gareeb तो हूँ और गरीब हो जाऊँगा .......और फिर दूसरी बात जे भी है कि जब किसी गरीब को सांप कटेगा ,तो ये तहसील बाबु उसके घर वाले को फिर चेक नहीं देगा .......... रंगेया की बातों ने पूरे बैंक हाल में सिटिजनशिप का माहौल बना दिया ............ सब तरफ से आवाजे हुई .... पहले रंगेया का काम करो , भीड़ को चीरता हुआ मैंने जाकर रंगेया के हाथों सौ रूपये वाले नए पांच के पेकेट रख दिए ....... उसी पल रंगेया के चेहरे पर ख़ुशी के जो भाव प्रगट हुए वो जवां से बताये नहीं जा सकते ...... बस इतना ही बता सकते है कि पूरे हाल में खुशियों की phuljhhadiyan जरूर जल उठीं ...... हाल में खड़े लोंग कह उठे .... कि खुशियाँ हमारे आस -पास ही छुपी होती है यदि हम उनकी परवाह करे तो वे कहीं भी मिल सकती है ...........
जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

'' चुटका की चुटकी ''

हेड आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकविरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... । तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... । दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा ................. (--जय प्रकाश पाण्डेय , मायक्रो फायनेंस शाखा , भोपाल )

'' आत्म -गहराई ''

सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''जीवन जितना ही ऊंचा हो जाता है, जितना कि गहरा हो। जो ऊंचा तो होना चाहते हैं, लेकिन गहरे नहीं, उनकी असफलता सुनिश्चित है। गहराई के आधार पर ही ऊंचाई के शिखर संभलते हैं। दूसरा और कोई रास्ता नहीं। गहराई असली चीज है। उसे जो पा लेता है, उन्हें ऊंचाई तो अनायास ही मिल जाती है।
सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे!
आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है? जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।
(सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन )
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*जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

'' सत्यम -शिवम् -सुन्दरम ''

जीवन में सत्य, शिव और सुंदर के थोड़े से बीज बोओ। यह मत सोचना कि बीज थोड़े से हैं, तो उनसे क्या होगा! क्योंकि एक बीज अपने में हजारों बीज छुपाए हुए है। सदा स्मरण रखना कि एक बीज से पूरा उपवन पैदा हो सकताहैआजकिसी ने कहा है, ''मैंने बहुत थोड़ा समय देकर ही बहुत कुछ जाना है। थोड़े से क्षण मन की मुक्ति के लिए दिये और अलौकिक स्वतंत्रता का अनुभव किया। फूलों, झरनों और चांद-तारों के सौंदर्य-अनुभव में थोड़े-से क्षण बिताये और न केवल सौंदर्य को जाना, बल्कि स्वयं को सुंदर होता हुआ भी अनुभव किया। शुभ के लिए थोड़े-से क्षण दिये और जो आनंद पाया, उसे कहना कठिन है। तब से मैं कहने लगा कि प्रभु को तो सहज ही पाया जा सकता है। लेकिन हम उसकी ओर कुछ भी कदम न उठाने के लिए तैयार हों, तो दुर्भाग्य ही है । ''स्वयं की शक्ति और समय का थोड़ा अंश सत्य के लिये, शांति के लिये, सौंदर्य के लिये, शुभ के लिये दो और फिर तुम देखोगे कि जीवन की ऊंचाइयां तुम्हारे निकट आती जा रही हैं। और, एक बिलकुल अभिनव जगत अपने द्वार खोल रहा है, जिसमें कि बहुत आध्यात्मिक शक्तियां अंतर्गर्भित हैं। सत्य और शांति की जो आकांक्षा करता है, वह क्रमश: पाता है कि सत्य और शांति उसके होते जा रही हैं। और, जो सौंदर्य और शुभ की ओर अनुप्रेरित होता है, वह पाता है कि उनका जन्म स्वयं उसके ही भीतर हो रहा है।''सुबह उठकर आकांक्षा करो कि आज का दिवस सत्य, शिव और सुंदर की दिशा में कोई फल ला सके। और, रात्रि देखो कि कल से तुम जीवन की ऊंचाइयों के ज्यादा निकट हुए हो या नहीं। गहरी आकांक्षा स्वयं में गहरी आकांक्षा पैदा करता है। (सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)***************************************
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प्रस्तुति -जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा ,भोपाल

Friday, March 26, 2010

'' महत्व काम ''

स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते है । हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रक्रति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा , '' फल हीन अंजीर '' की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि बिना काम स्त्री -पुरुष झगड़ालू , असंतुस्ट ,अधीर और चिडचिडे हो जाते है चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें , जो यह शिकायत करे कि '' मेरे पास कोई काम नहीं है '' या '' मुझसे काम नहीं बनता '' उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए , उसके चेहरे पर थकावट -सी छाई हुई होगी ...... उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा । कई लोग ऐसा सोचते है कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान है या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है ,मनुष्यता का , या पौरुष का अपमान है , यह पुर्णतः अप्राक्र्तिक और लोकिक नियमो के विपरीत है ..... अपनी रोजी -रोटी के लिए thodee कमाई कर के अपने अन्दर अहं पल लेना ......बाल -बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए ........ सोचो तो जरा ...... अरे भाई कुछ काम करो । कुछ काम करो .... जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो ............ । तो कुछ तो ऐसा 'काम' कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रसस्त हो.... जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल -पहल और खुशियाली मिटटी में मिल जायेगी ... अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम ... काम ॥और श्रम ही वास्तव में असली देवता है ।
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-जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

'' कर के तो देखो ''

हमारी सदेव यह अभिलाषा रहती है कि दूसरे लोग हम से प्यार करें ....... हमसे मीठा बोलें, मधुर व्यवहार करे ...., सहयोग दें .....,सहायता प्रदान करें ......, पर हमें यह भी तो सोचना चाहिए कि दूसरा भी हमसे ऐसी ही अपेक्षा रखता है । इसलिए हमारा कर्त्तव्य हो जाता है कि हम जो चाहते है पहले उसे व्यवहार में आने दे , अब उसकी प्रतिक्रिया तो स्वयमेव उत्पन्न होगी ...... । पुचकारने से पशु और पक्षी तक आत्मीयता प्रगट करने लगते है फिर हमको -आपको क्या कहा जाये ? हम -आप तो प्रेम के लिए , आत्मीयता के लिए अपनी झोली फेलाए फिरते है ... अरे सीधी सी बात है आप मानवता /मनुष्य से प्रेम करिए संसार आपका आभारी होगा ..... आप लोगों के साथ नेकी का व्यवहार तो कर के देखिये .... आप की भलाई का समन्दर उमड़ पड़ेगा , परोपकार के नाम पर आपका किया हुआ हर कार्य असंख्य गुना होकर लोटेगा और आपके चारों ओर सुख , शांति , और संतोष बिखर जावेगा ।
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-जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

Tuesday, March 23, 2010

'' परसाई की रचनाओं से ''

.इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं,पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं.
2.जो कौम भूखी मारे जाने पर सिनेमा में जाकर बैठ जाये ,वह अपने दिन कैसे बदलेगी!
3.अच्छी आत्मा फोल्डिंग कुर्सी की तरह होनी चाहिये.जरूरत पडी तब फैलाकर बैठ गये,नहीं तो मोडकर कोने से टिका दिया.
4.अद्भुत सहनशीलता और भयावह तटस्थता है इस देश के आदमी में.कोई उसे पीटकर पैसे छीन ले तो वह दान का मंत्र पढने लगता है.

5.अमरीकी शासक हमले को सभ्यता का प्रसार कहते हैं.बम बरसते हैं तो मरने वाले सोचते है,सभ्यता बरस रही है.
6.चीनी नेता लडकों के हुल्लड को सांस्कृतिक क्रान्ति कहते हैं,तो पिटने वाला नागरिक सोचता है मैं सुसंस्कृत हो रहा हूं.
7.इस कौम की आधी ताकत लडकियों की शादी करने में जा रही है.
8.अर्थशास्त्र जब धर्मशास्त्र के ऊपर चढ बैठता है तब गोरक्षा आन्दोलन के नेता जूतों की दुकान खोल लेते हैं.
9.जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का खून बिना छना पी जाते हैं .
10.नशे के मामले में हम बहुत ऊंचे हैं.दो नशे खास हैं–हीनता का नशा और उच्चता का नशा,जो बारी-बारी से चढते रहते हैं.
11.शासन का घूंसा किसी बडी और पुष्ट पीठ पर उठता तो है पर न जाने किस चमत्कार से बडी पीठ खिसक जाती है और किसी दुर्बल पीठ पर घूंसा पड जाता है.
12.मैदान से भागकर शिविर में आ बैठने की सुखद मजबूरी का नाम इज्जत है.इज्जतदार आदमी ऊंचे झाड की ऊंची टहनी पर दूसरे के बनाये घोसले में अंडे देता है.
13.बेइज्जती में अगर दूसरे को भी शामिल कर लो तो आधी इज्जत बच जाती है.
14.मानवीयता उन पर रम के किक की तरह चढती – उतरती है,उन्हें मानवीयता के फिट आते हैं.
15.कैसी अद्भुत एकता है.पंजाब का गेहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है और मध्यप्रदेश का चावल कलकत्ता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है.देश एक है.कानपुर का ठग मदुरई में ठगी करता है,हिन्दी भाषी जेबकतरा तमिलभाषी की जेब काटता है और रामेश्वरम का भक्त बद्रीनाथ का सोना चुराने चल पडा है.सब सीमायें टूट गयीं.
16.रेडियो टिप्पणीकार कहता है–’घोर करतल ध्वनि हो रही है.’मैं देख रहा हूं,नहीं हो रही है.हम सब लोग तो कोट में हाथ डाले बैठे हैं.बाहर निकालने का जी नहीं होत.हाथ अकड जायेंगे.लेकिन हम नहीं बजा रहे हैं फिर भी तालियां बज रही हैं.मैदान में जमीन पर बैठे वे लोग बजा रहे हैं ,जिनके पास हाथ गरमाने को कोट नहीं हैं.लगता है गणतन्त्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है.गणतन्त्र को उन्हीं हाथों की तालियां मिलती हैं,जिनके मालिक के पास हाथ छिपाने के लिये गर्म कपडा नहीं है.
17.मौसम की मेहरवानी का इन्तजार करेंगे,तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी.मौसम के इन्तजार से कुछ नहीं होता.वसंत अपने आप नहीं आता,उसे लाना पडता है.सहज आने वाला तो पतझड होता है,वसंत नहीं.अपने आप तो पत्ते झडते हैं.नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण-रस पीकर पैदा होते हैं.वसंत यों नहीं आता.शीत और गरमी के बीच जो जितना वसंत निकाल सके,निकाल ले.दो पाटों के बीच में फंसा है देश वसंत.पाट और आगे खिसक रहे हैं.वसंत को बचाना है तो जोर लगाकर इन दो पाटों को पीचे ढकेलो–इधर शीत को उधर गरमी को .तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसंत.
18.सरकार कहती है कि हमने चूहे पकडने के लिये चूहेदानियां रखी हैं.एकाध चूहेदानी की हमने भी जांच की.उसमे घुसने के छेद से बडा छेद पीछे से निकलने के लिये है.चूहा इधर फंसता है और उधर से निकल जाता है.पिंजडे बनाने वाले और चूहे पकडने वाले चूहों से मिले हैं.वे इधर हमें पिंजडा दिखाते हैं और चूहे को छेद दिखा देते हैं.हमारे माथे पर सिर्फ चूहेदानी का खर्च चढ रहा है.
19.एक और बडे लोगों के क्लब में भाषण दे रहा था.मैं देश की गिरती हालत,मंहगाई ,गरीबी,बेकारी,भ्रष्टाचारपर बोल रहा था और खूब बोल रहा था.मैं पूरी पीडा से,गहरे आक्रोश से बोल रहा था .पर जब मैं ज्यादा मर्मिक हो जाता ,वे लोग तालियां पीटने लगते थे.मैंने कहा हम बहुत पतित हैं,तो वे लोग तालियां पीटने लगे.और मैं समारोहों के बाद रात को घर लौटता हूं तो सोचता रहता हूं कि जिस समाज के लोग शर्म की बात पर हंसे,उसमे क्या कभी कोई क्रन्तिकारी हो सकता है?होगा शायद पर तभी होगा जब शर्म की बात पर ताली पीटने वाले हाथ कटेंगे और हंसने वाले जबडे टूटेंगे .
20.निन्दा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं.निन्दा खून साफ करती है,पाचन क्रिया ठीक करती है,बल और स्फूर्ति देती है.निन्दा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं.निन्दा पयरिया का तो सफल इलाज है.सन्तों को परनिन्दा की मनाही है,इसलिये वे स्वनिन्दा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं.
21.मैं बैठा-बैठा सोच रहा हूं कि इस सडक में से किसका बंगला बन जायेगा?…बडी इमारतों के पेट से बंगले पैदा होते मैंने देखे हैं.दशरथ की रानियों को यज्ञ की खीर खाने से पुत्र हो गये थे.पुण्य का प्रताप अपार है.अनाथालय से हवेली पैदा हो जाती है.
-Jai Prakash Pandey
micro finance branch, Bhopal

''सफलता की कहानी ''

Targeting woman through micro finance has proved to be a successful and efficient economic development tool Laxmibai Kelabag aged about 37 years was married 19 years before with Snesh kumar kelabag resident of village Newton block Parasia Dist, Chhindwara। Snesh kumar is patient of epilepsy and hence is unable to do any work। Laxmibai has two children, She wanted to educate them but due to husband inability to earn and poverty their schooling was discontinued। The in laws also didn’t help her । Laxmibai was working as farm laborer for her families livelihood, She was unable to get work throughout the year and as such many times।Her children had to sleep without food। She then along with other four women formed JLG and availed help from small finance scheme। Micro Finance Branch Bhopal sanctioned loan to Vikas Samiti Chhindwara for on-lending to SHGs /JLGs ।Vikas samiti provided them training for tailoring. After the training Vikas samiti provided them Rs. 7000/- loan under small finance scheme to purchase stitching machine and raw materials per members, Now Laxmibai is earning about Rs. 3000 to 4000 per month . She is regular in paying loan installments. Children of Laxmi bai are now going to school and getting food they are happy today.Putting extra income in women’s hands is the most efficient way of affect an entire family.
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-जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा भोपाल

'' आगाज ''

A small act can change a life – a radical change from rags to riches!On the path of life we often pass by people, who have the streets as their home, the leftovers thrown into the dustbin as their food and oversized or undersized torn clothes to cover their skin and bones. It is a far cry to think of them having the greater joys of life like love, respect and belongingness. Yet, their condemned state hardly hits the heart of the many who would not even give them a glance of compassion, who walk away indifferent to the pain of hunger borne by innocent children and adults. One such moment made Shri Jai Prakash Pandey, Manager, Microfinance Branch, Bhopal dedicate his entire life to the poor and make tremendous positive differences in the life of women and children, especially in the tribal areas.A recent experience he had is worth mentioning here and emulating by others, where a small loan provided by him changed the destiny of a student.SBI, the great Bank that it is, had come up with a new concept, for the first time in India , where with the help of NGOs, in unbanked areas, women upliftment is given top priority. In Jhabua, at Jobat village, Alirajpur which is one of the Adivasi areas, Shri Jai Prakash conducted a meeting of 50 women, with the aim of bringing about a smile on their face, prosperity in their life by making available small funds without much formalities, through NGOs, so that they can be released from the deadly clutches of moneylenders.The small loan amount was ‘nai roshni ki kiran’ (a new ray of light) for the women in their own words. For 30 kms and more the area had no banks, people were unaware of banking facilities and also scared to step into a neat looking bank for the fear of the fact that they are not welcome anywhere!In the meeting, a woman narrated how Rs. 3000/- provided by the State Bank of India in time helped her pay the college fees of her son, who was doing engineering; else he would have lost about 3 years of his valuable time. This small amount enabled her son to write his exam. No wonder, since the brilliant boy had the ability and with Mr. Jai Prakash taking keen interest in their welfare, he topped the college and brought laurels to his poor parents and his village!Our Micro Finance branch has disbursed about 80 lacs in unbanked and remote areas on an average of Rs. 2000/- to Rs. 5000/- per family, introducing the joy of life to the downtrodden. Mr Jai Prakash Pandey interacting with the members of Priyasakhi Mahila Sangh, IndoreWorking for the tribals and the masses that are cut off from the society, has become part of Shri Jai Prakash’s nature. He was also BM, at Narayanganj Branch (District Mandla) and was convener of ‘Chutka Jagrati Manch’, which is a social and welfare organization for tribals. His records reveal that he has been able to uplift 80000 women in M.P. and Chattisgarh. Our Micro Finance branch has also sanctioned 13 crores since April this year - branch where he supports his CM and both have no other staff for assistance. His motive in life is to make SBI the prime bank through putting into action Citizenship in him and increasing it by soul searching all the time. He adds with a bright smile that he has been able to introduce banking to the common man who is underprivileged. This is his inner fruit that adds to his passion to do more for the ignored.The Almighty lent his pen to Shri Jai Prakash to rewrite the destiny of the Engineer boy. Can we also do our might for the unfortunate who have all the ability but lack the small amount of help that we can so easily provide and be in the good books of the Almighty?Remember, He loves those who love His creatures and cares for them. As promised then our Destiny is also taken care of by Him.Contributed by: MS. HARINA SHARMA, FACULTY, SBLC, INDOREreena.sharma@sbi.co.in

''परसाई की एक रचना ''

निंदा में विटामिन और प्रोटीन होते हैं। निंदा खून साफ करती है, पाचन-क्रिया ठीक करती है, बल और स्फूर्ति देती है। निंदा से मांसपेशियां पुष्ट होती हैं। निंदा पायरिया का तो शर्तिया इलाज है। संतों को परनिंदा की मनाही होती है, इसलिए वे स्वनिंदा करके स्वास्थ्य अच्छा रखते हैं। ‘मौसम कौन कुटिल खल कामी’- यह संत की विनय और आत्मग्लानि नहीं है, टॉनिक है। संत बड़ा कांइया होता है। हम समझते हैं, वह आत्मस्वीकृति कर रहा है, पर वास्तव में वह विटामिन और प्रोटीन खा रहा है।स्वास्थ्य विज्ञान की एक मूल स्थापना तो मैंने कर दी। अब डॉक्टरों का कुल इतना काम बचा कि वे शोध करें कि किस तरह की निंदा में कौन से और कितने विटामिन होते हैं, कितना प्रोटीन होता है। मेरा अंदाज है, स्त्री संबंधी निंदा में प्रोटीन बड़ी मात्रा में होता है और शराब संबंधी निंदा में विटामिन बहुत होते हैं।मेरे सामने जो स्वस्थ सज्जन बैठे थे, वे कह रहे थे- आपको मालूम है, वह आदमी शराब पीता है?मैंने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने फिर कहा- वह शराब पीता है।निंदा में अगर उत्साह न दिखाओ तो करने वालों को जूता-सा लगता है। वे तीन बार बात कह चुके और मैं चुप रहा, तीन जूते उन्हें लग गए। अब मुझे दया आ गई। उनका चेहरा उतर गया था।मैंने कहा- पीने दो।वे चकित हुए। बोले- पीने दो, आप कहते हैं पीने दो?मैंने कहा- हां, हम लोग न उसके बाप हैं, न शुभचिंतक। उसके पीने से अपना कोई नुकसान भी नहीं है।उन्हें संतोष नहीं हुआ। वे उस बात को फिर-फिर रेतते रहे।तब मैंने लगातार उनसे कुछ सवाल कर डाले- आप चावल ज्यादा खाते हैं या रोटी? किस करवट सोते हैं? जूते में पहले दाहिना पांव डालते हैं या बायां?अब वे ‘हीं-हीं’ पर उतर आए। कहने लगे- ये तो प्राईवेट बातें हैं, इनसे क्या मतलब।मैंने कहा- वह क्या खाता-पीता है, यह उसकी प्राईवेट बात है। मगर इससे आपको जरूर मतलब है। किसी दिन आप उसके रसोईघर में घुसकर पता लगा लेंगे कि कौन-सी दाल बनी है और सड़क पर खड़े होकर चिल्लाएंगे- वह बड़ा दुराचारी है। वह उड़द की दाल खाता है।तनाव आ गया। मैं पोलाइट हो गया- छोड़ो यार, इस बात को। वेद में सोमरस की स्तुति में 60-62 मंत्र हैं। सोमरस को पिता और ईश्वर तक कहा गया है। कहते हैं- तुमने मुझे अमर बना दिया। यहां तक कहा है कि अब मैं पृथ्वी को अपनी हथेलियों में लेकर मसल सकता हूं।(ऋषि को ज्यादा चढ़ गई होगी।) चेतन को दबाकर राहत पाने या चेतना का विस्तार करने के लिए सब जातियों के ऋषि किसी मादक द्रव्य का उपयोग करते थे।चेतना का विस्तार। हां, कई की चेतना का विस्तार देख चुका हूं। एक संपन्न सज्जन की चेतना का इतना विस्तार हो जाता है कि वे रिक्शेवाले को रास्ते में पान खिलाते हैं, सिगरेट पिलाते हैं, और फिर दुगने पैसे देते हैं। पीने के बाद वे ‘प्रोलेतारियत’ हो जाते हैं। कभी-कभी रिक्शेवाले को बिठाकर खुद रिक्शा चलाने लगते हैं। वे यों भी भले आदमी हैं। पर कुछ मैंने ऐसे देखे हैं, जो होश में मानवीय हो ही नहीं सकते। मानवीयता उन पर रम के ‘किक’ की तरह चढ़ती-उतरती है। इन्हें मानवीयता के ‘फिट’ आते हैं- मिरगी की तरह। सुना है मिरगी जूता सुंघाने से उतर जाती है। इसका उल्टा भी होता है। किसी-किसी को जूता सुंघाने से मानवीयता का फिट भी आ जाता है। यह नुस्खा भी आजमाया हुआ है।एक और चेतना का विस्तार मैंने देखा था। एक शाम रामविलास शर्मा के घर हम लोग बैठे थे(आगरा वाले रामविलास शर्मा नहीं। वे तो दुग्धपान करते हैं और प्रात: समय की वायु को ‘सेवन करता सुजान’ होते हैं)। यह रोडवेज के अपने कवि रामविलास शर्मा हैं। उनके एक सहयोगी की चेतना का विस्तार कुल डेढ़ पेग में हो गया और वे अंग्रेजी बोलने लगे। कबीर ने कहा है- ‘मन मस्त हुआ तब क्यों बोले’। यह क्यों नहीं कहा कि मन मस्त हुआ तब अंग्रेजी बोले। नीचे होटल से खाना उन्हीं को खाना था। हमने कहा- अब इन्हें मत भेजो। ये अंग्रेजी बोलने लगे। पर उनकी चेतना का विस्तार जरा ज्यादा ही हो गया था। कहने कहने लगे- नो सर, नो सर, आई शैल ब्रिंग ब्यूटीफुल मुर्गा। ‘अंग्रेजी’ भाषा का कमाल देखिए। थोड़ी ही पढ़ी है, मगर खाने की चीज को खूबसूरत कह रहे हैं। जो भी खूबसूरत दिखा, उसे खा गए। यह भाषा रूप में भी स्वाद देखती है। रूप देखकर उल्लास नहीं होता, जीभ में पानी आने लगता है। ऐसी भाषा साम्राज्यवाद के बड़े काम की होती है। कहा- इंडिया इज ए ब्यूटीफुल कंट्री। और छुरी-कांटे से इंडिया को खाने लगे। जब आधा खा चुके, तब देशी खाने वालों ने कहा, अगर इंडिया इतना खूबसूरत है, तो बाकी हमें खा लेने दो। तुमने ‘इंडिया’ खा लिया। बाकी बचा ‘भारत’ हमें खाने दो। अंग्रेज ने कहा- अच्छा, हमें दस्त लगने लगे हैं। हम तो जाते हैं। तुम खाते रहना। यह बातचीत 1947 में हुई थी। हम लोगों ने कहा- अहिंसक क्रांति हो गई। बाहर वालों ने कहा- यह ट्रांसफर ऑफ पॉवर है- सत्ता का हस्तांतरण। मगर सच पूछो तो यह ‘ट्रांसफर ऑफ डिश’ हुआ- थाली उनके सामने से इनके सामने आ गई। वे देश को पश्चिमी सभ्यता के सलाद के साथ खाते थे। ये जनतंत्र के अचार के साथ खाते हैं।फिर राजनीति आ गई। छोड़िए। बात शराब की हो रही थी। इस संबंध में जो शिक्षाप्रद बातें ऊपर कहीं हैं, उन पर कोई अमल करेगा, तो अपनी ‘रिस्क’ पर। नुकसान की जिम्मेदारी कंपनी की नहीं होगी। मगर बात शराब की भी नहीं, उस पवित्र आदमी की हो रही थी, जो मेरे सामने बैठा किसी के दुराचार पर चिंतित था।मैं चिंतित नहीं था, इसलिए वह नाराज और दुखी था।मुझे शामिल किए बिना वह मानेगा नहीं। वह शराब से स्त्री पर आ गया- और वह जो है न, अमुक स्त्री से उसके अनैतिक संबंध हैं।मैंने कहा- हां, यह बड़ी खराब बात है।उसका चेहरा अब खिल गया। बोला- है न?मैंने कहा- हां खराब बात यह है कि उस स्त्री से अपना संबंध नहीं है।वह मुझसे बिल्कुल निराश हो गया। सोचता होगा, कैसा पत्थर आदमी है यह कि इतने ऊंचे दर्जे के ‘स्कैंडल’ में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा। वह उठ गया। और मैं सोचता रहा कि लोग समझते हैं कि हम खिड़की हवा और रोशनी के लिए बनवाते हैं, मगर वास्तव में खिड़की अंदर झांकने के लिए होती है।कितने लोग हैं जो ‘चरित्रहीन’ होने की इच्छा मन में पाले रहते हैं, मगर हो नहीं सकते और निरे ‘चरित्रवान’ होकर मर जाते हैं। आत्मा को परलोक में भी चैन नहीं मिलता होगा और वह पृथ्वी पर लोगों के घरों में झांककर देखती होगी कि किसका संबंध किससे चल रहा है।किसी स्त्री और पुरुष के संबंध में जो बात अखरती है, वह अनैतिकता नहीं है, बल्कि यह है कि हाय उसकी जगह हम नहीं हुए। ऐसे लोग मुझे चुंगी के दरोगा मालूम होते हैं। हर आते-जाते ठेले को रोककर झांककर पूछते हैं- तेरे भीतर क्या छिपा है?एक स्त्री के पिता के पास हितकारी लोग जाकर सलाह देते हैं- उस आदमी को घर में मत आने दिया करिए। वह चरित्रहीन है।वे बेचारे वास्तव में शिकायत करते हैं कि पिताजी, आपकी बेटी हमें ‘चरित्रहीन’ होने का चांस नहीं दे रही है। उसे डांटिए न कि हमें भी थोड़ा चरित्रहीन हो लेने दे।जिस आदमी की स्त्री-संबंधी कलंक कथा वह कह रहा था, वह भला आदमी है- ईमानदार, सच्चा, दयालु, त्यागी। वह धोखा नहीं करता, कालाबाजारी नहीं करता, किसी को ठगता नहीं है, घूस नहीं खाता, किसी का बुरा नहीं करता।
एक स्त्री से उसकी मित्रता है। इससे वह आदमी बुरा और अनैतिक हो गया।बड़ा सरल हिसाब है अपने यहां आदमी के बारे में निर्णय लेने का। कभी सवाल उठा होगा समाज के नीतिवानों के बीच के नैतिक-अनैतिक, अच्छे-बुरे आदमी का निर्णय कैसे किया जाए। वे परेशान होंगे। बहुत सी बातों पर आदमी के बारे में विचार करना पड़ता है, तब निर्णय होता है। तब उन्होंने कहा होगा- ज्यादा झंझट में मत पड़ो। मामला सरल कर लो। सारी नैतिकता को समेटकर टांगों के बीच में रख लो।
Excerpted from Parsai Rachnawali by Jai Prakash Pandey, Micro Finance Branch, Bhopal
(Shri Harishankar Parsai is a noted Hindi satirist.)

''समय की रेत पर सिटिजन एस बी आई के निशान ''

श्री जगत सिंह बिष्ट की सकारात्मक सोच एवं समर्पण की भावना ने सिटिजन एसबीआई ब्लॉग को आकार दिया और इस अविराम यात्रा ने पूरे स्टेट बैंक परिवार को जगा दिया ...... अच्छे एवं सच्चे नागरिक बनने का जूनून .... अपने अन्दर की क्षमताओं और अपने अन्दर की असीमित उर्जा को पहिचान कर उसे सही दिशा में रूपांतरित करने की प्रेरणा एवं ''वसुधैव कुटम्बकम '' की पवित्र भावना के साथ रचनात्मक कार्यों एवं स्वाभाव में परिवर्तन करना और अच्छे और सच्चे नागरिक बनना और बनाना ......................... हाँ , यही तो उद्धेश्य है सिटिजन एसबीआई के ........... । अनुभवों की परिपक्व बारात के जरिये सिटिजन एसबीआई ने जन-पहल एवं परिवर्तन की जो बानगी अभी तक ब्लॉग के विभिन्न घटनात्मक विवरणों में दिखाई है , लगता है सिटिजन एसबीआई स्टेट बैंक परिवार के सारे संसार को '' नर से नारायण '' बनने की तकनीक सिखा रहा है .........दिलों के अन्दर छुपी अनुभवों की अमूल्य खदान से हीरे -जवाहरात खोद कर उन्हें इस ' जगत' (संसार) के सामने खुले दिल से बाँटने में facilitator ' हरिना शर्मा ' का जबाब नहीं .......... । हरिना शर्मा ने सेना से रिटायर हुए गार्ड एवं मेसेंजर के जीवन के ऐसे अनसुलझे से अनुभवों को उगलवाकर ताने-बाने के साथ जिस तरह से प्रस्तुत किया है वह काबिले तारीफ है ही ...... और इस बात का भी संकेत है कि हरिना में मानवीय संवेदनाओं की सूक्ष्म पकड़ रखने वाले खबरनवीसी (पत्रकार) के गुण समाये है ................ ।स्टेट बैंक अपनों से जुडा अच्छे -सच्चे नागरिकों का बैंक है , एवं सिटिजन एसबीआई जैसे जन --कल्याण कारी अभियान से इस जगत को नर से नारायण बनाने की सकारात्मक सोच के साथ आगे बड रहा है , हम और हमारा हर कस्टमर इस सकारात्मक सोच से स्टेट बैंक को नए युग में ले जा रहा है , इस अविराम यात्रा के ''मुखिया '' हमारे सम्मानीय चेयरमैन साहब श्री ओ .पी .भट्ट जी इस नए युग के प्रणेता बनकर '' मानवीय आत्मा की अपने दिमाग व स्वाभाव पर विजय '' के जरिये स्टेट बैंक को दुनिया का पहले नंबर का मानवीय मूल्यों का असली बैंक बनाने की राह पर चल पड़े है .................... शुभकामनाएँ !स्वप्न भरे सुनहरे सुझाव ---केन्द्रीकृत सिटिजन एसबीई सेंटर का हो निर्माण ,-सिटिजन एसबीआई सेंटर से ई -पत्रिका की हो शुरुआत ,- सिटिजन एसबीआई सेंटर से ई - बातचीत का हो आगाज ,- सिटिजन एसबीआई सेंटर में चेयरमान साहब के चुनिन्दा स्पीच का हो संकलन ,- सिटिजन एसबीआई सेंटर के मार्फ़त हर माह स्टाफ से प्राप्त एक प्रश्न का हो जबाब ,- सिटिजन एसबीआई सेंटर के मार्फत हर सर्किल सी.जी. एम. की माह में एक बार किसी भी एक स्टाफ से पांच मिनिट हो बातचीत ,- सिटिजन एसबीआई सेंटर सबसे अच्छी कस्टमर सर्विस देने वाली एक शाखा को हर साल दे पुरस्कार .....

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-जय प्रकाश पाण्डेय

माइक्रो फाइनेंस शाखा

भोपाल

Monday, March 22, 2010

'' कामयाबी ''

इन दिनों हर कोई जल्‍द से जल्‍द सफलता हासिल करना चाहता है, लेकिन सफलता का कोई शॉर्टकट फार्मूला नहीं है। इसके लिए सही दिशा में अथक परिश्रम, सेल्‍फ मोटिवेशन के अलावा, बदलते वक्‍त के साथ-साथ नई तकनीकी से भी खुद को अपडेट करके सफलता हासिल की जा सकती है। और ऐसा करके ही आप आज के कॉम्पिटेटिव वर्क-प्‍लेस में सफलता के बारे में सोच सकते हैं।
यदि आप कुछ खास बातों पर अमल करें, तो सकारात्‍मक परिणाम मिल सकते हैं।वही करें, जो पंसद होहर प्रोफेशनल की यह इच्‍छा होती है कि उसे ऐसा काम मिले, जिसमें संतुष्टि हो, चुनौतियां हों आगे बढ़ने के अवसर हों और पैसे भी हों। लेकिन कुछेक लोग ही ऐसे होते हैं, जिन्‍हें इस तरह का अवसर मिलता है। मनोवैज्ञानिक अशुम गुप्‍ता कहती है कि कामयाबी आपकी रुचि, दृढ़ इच्‍छाशक्ति और स्‍वयं के प्रति आपकी प्रतिबद्धता पर ही निर्भर करती है। इसलिए आप वही काम करें, जो आपकी पंसद हो। सफल होने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले अपनी च्‍वाइस तय करें और एक निश्चित लक्ष्‍य बनाएं, फिर पूरे मनोयोग से अपने कार्य में लग जाएं।
दरअसल, कामयाबी की कहानी यहीं से शुरू होती hai , safalta कहीं ओर नहीं, बल्कि आपके विश्‍वास और सिद्धांतों पर भी निर्भर करती है। अपने मौलिक गुणों, विश्‍वास और रुचियों को समझें और उन्‍हें प्राथमिकता दें। क्‍योंकि यही आपको सफलता की राह दिखाएंगी, मंजिल तक ले जाएंगी और समझाएंगी कि सफलता आपके दृष्टिकोण और सिद्धांतों में निहित hai । saphalataa एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। इसलिए छोटी-छोटी उपलब्धियों के बल पर आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए अगर आप कोई बड़ा काम नहीं कर पा रहे हैं, तो छोटे या सामान्‍य काम से ही शुरूआत कर सकते हैं।
सच तो यह है कि अपनी रुचि के क्षेत्र में यह सामान्‍य काम ही सफलता की ओर आपका पहला कदम होगा। प्रत्‍येक अगला कदम आपको अपने लक्ष्‍य के नजदीक ले जाएगा। क्‍योंकि बूंद-बूंद से ही तालाब भरता है। आपके वे छोटे-छोटे कदम एक दिन बड़ी दूरी तय कर लेंगे।सीखने की lalk की प्रक्रिया कभी बंद नहीं होनी चाहिए, क्‍योंकि यही आपको अनुभव और संतुष्टि देती है। अपनी असफलताओं से भी सबक लें। क्‍योंकि असफलता सबसे महत्‍वपूर्ण शिक्षक है।
दरअसल यही बताता है कि कमी कहां है, जरूरत किस बात की है और आपसे क्‍या गलती हुई है।असफलताओं को न जाने दे बेकारअसफलता तब बेकार चली जाती है जब आप उस पर पछताने के अलावा कुछ सीखने का प्रयास ही नहीं करते हैं। तब तक यह हार खुद को बार-बार दोहराती है जब तक आप उससे सबक लेकर खुद में सुधार नहीं लाते हैं। हो सकता है, व्‍यक्ति असफलता या मुश्किलों से डरे, लेकिन ये भी सफलता के ही रास्‍ते हैं।याद रखें, सफलता के लिए किया गया प्रयत्‍न नई सोच एवं नया दृष्टिकोण विकसित करता है।
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_जय प्रकाश पाण्डेय

'' कुछ काम करो ''

स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते है । हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रक्रति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा , '' फल हीन अंजीर '' की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि बिना काम स्त्री -पुरुष झगड़ालू , असंतुस्ट ,अधीर और चिडचिडे हो जाते है चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें , जो यह शिकायत करे कि '' मेरे पास कोई काम नहीं है '' या '' मुझसे काम नहीं बनता '' उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए , उसके चेहरे पर थकावट -सी छाई हुई होगी ...... उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा । कई लोग ऐसा सोचते है कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान है या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है ,मनुष्यता का , या पौरुष का अपमान है , यह पुर्णतः अप्राक्र्तिक और लोकिक नियमो के विपरीत है ..... अपनी रोजी -रोटी के लिए thodee कमाई कर के अपने अन्दर अहं पल लेना ......बाल -बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए ........ सोचो तो जरा ...... अरे भाई कुछ काम करो । कुछ काम करो .... जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो ............ । तो कुछ तो ऐसा 'काम' कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रसस्त हो.... जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल -पहल और खुशियाली मिटटी में मिल जायेगी ... अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम ... काम ..और श्रम ही वास्तव में असली देवता है , और यही सिटिजन एस बी आई का मूल ध्येय है .........--जय प्रकाश पाण्डेय

Monday, March 1, 2010

AJAB-GAJAB RECOVERY

किसी ने ठीक ही कहा है कि कर्ज फर्ज और मर्ज को कभी नहीं भूलना चाहिए , लेकिन इस आदर्श वाक्य को लोग पढकर टाल देते है । कर्ज लेते समय तो उनका व्यवहार अत्यंत मृदु होता है , लेकिन मतलब निकलने के बाद वे नजरें चुराने लगते है , कई ऐसे लोग है जो बैंक से काफी लोन लेकर उसे पचा जाते है , लेकिन ऐसे भी लोगों की कमी नहीं जो कर्ज , फर्ज और मर्ज का बराबर ख्याल रखते है । नारायणगंज (मंडला) एरिया के एक कर्जदार ने अपनी मृत्यु के बाद भी बैंक से लिए कर्ज को चुकाने सपने में अपने परिजन को प्रेरित किया जिससे उसके द्रारा२० साल पहले लिया कर्ज पट गया लोगों ने दातों तले उगलियाँ दबा कर हतप्रद रह गए ।
स्टेट बैंक नारायणगंज के शाखा प्रबन्धक के रूप में इस मामले का खुलासा करने में तनिक हिचक और आश्चर्य के साथ सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा था , ''किसी से बताना नहीं पर ऐसा अनुभव हुआ है '' ........यह बात फेलते - फेलते खबरनबीसों तक पहुच गई , फिर देनिक भास्कर और देनिक नई दुनिया ने इस खबर को प्रमुखता से छापा,
खबर यह थी कि २० साल पहले एक ने बैंक से कर्ज लिया था , लेकिन कर्ज चुकाने के पहले ही वह परलोक सिधार गया ............ । उसके बेटे ने एक दिन बैंक में आकर अपने पिता द्वारा लिए गए कर्ज की जानकारी ली , बेटे ने मुझे बताया कि उसके पिता बार-बार सपने में आते है और बार-बार यही कहते है कि बेटा बैंक का कर्ज चूका दो ,पहले तो मुझे और शाखा के स्टाफ को आश्चर्य हुआ और बात पर भरोसा नहीं हुआ , लेकिन उसके बेटे के चहरे के दर्द और भावना पर गौर करते हुए अप्लेखित खातों की सूची में उसके पिता का नाम मिल ही गया ,उसकी बात पर कुछ यकीन भी हुआ , फिर उसने बताया कि पिता जी की बहुत पहले मृत्यु हो गई थी ,पर कुछ दिनों से हर रात को पिता जी सपने में आकर पूछते है की कर्ज का क्या हुआ ? और मेरी नींद खुल जाती है फिर सो नहीं पता , लगातार २० दिनों से नहीं सो पाया हूँ ,आज किसी भी हालत में पिता जी का कर्ज चूका कर ही घर जाना हो पायेगा । अधिक नहीं मात्र १६५००/ का हिसाब ब्याज सहित बना , उसने हँसते -हँसते चुकाया और बोला - आज तो सच में गंगा नहए जैसा लग रहा है ,
अगले दो-तीन दिनों तक मेनें उसकी खोज -खबर ली , उसने बताया की कर्ज चुकने के बाद पिता जी बिलकुल भी नहीं दिखे , उस दिन से उसे खूब नीदं आ रही है ,
इस तरह एक सिटिज़न मृतात्मा की प्रेरणा से जहाँ बैंक की वसूली हो गई वहीँ एक पुत्र पित्र्य-लोन से मुक्त हो गया ,इस खबर को तमाम जगहों पढ़ा गया और कई दूर-दराज शाखों की २०-२० साल पुरानी अप्लेखित खातों में खूब वसूली हुई । लोग याद करते है की स्टेट बैंक में ऐसे सिटिज़न कर्जदार भी होते है जो मरकर भी अपने कर्ज को चुकाते हुए बैंक की वसूली का माहौल भी बनाते है ...... उस मृतात्मा को साधुवाद .... सलाम ...
ये संयोग भी है और मजे की बात भी , की जिस साल इस सिटिज़न मृतात्मा का ये वसूली अभियान का समाचार अख़बारों के मार्फ़त मंडला जिले में फेला , उस साल मध्य प्रदेश में आर आर सी दायर खातों (अप्लेखित खातों ) में सबसे अधिक वसूली हेतु मंडला जिले को प्रथम पुरस्कार हेतु शासन ने चुना । ...... धन्य हो सिटिज़न मृतात्मा ........., तुम्हे सलाम ......

CHUTKA KI ROTI

हेड आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकविरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... ।
तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... ।
दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।
कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?
वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा .................
--जय प्रकाश पाण्डेय
मायक्रो फायनेंस शाखा

GAR HOSHLE BULAND HON........

गरीब अन्पड महिलाएं , जो बैंक विहीन आबादी में निवास करती है , जो लोन लेने के लिए साहूकारों के नाज- नखरों को सहन करती हुई लोन लेती थीं , जो बैंकों से लोन लेने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोच सकतीं थी , ऐसी महिलाओं के आर्थिक उन्नयन में माइक्रो फाइनेंस की अवधारणा मील का पत्थर साबित हो रही है , किसी ने कहा है '' कमीं नहीं है कद्र्ता की ....कि अकबर करे कमाल पैदा .........इस भाव को स्व सहायता समूह से जुडी महिलाओं ने बता दिया है कि '' गर होंसले बुलंद है तो पहाड़ में भी रास्ते बन जाते है ........
स्टेट बैंक की माइक्रो फाइनेंस शाखा ने होशंगाबाद के एक गेर सरकारी संगठन '' युक्ति समाज सेवा सोसायटी को २५ लाख का लोन दिया था ,लोन इन रिमोट एरिया एवं बैंक विहीन आबादी के स्व सहायता समूह की महिलाओं के आर्थिक उन्नयन हेतु दिया गया था , लोन राशी की उपयोगिता के सर्वे , जांच एवं इन महिलाओं की इनकम जेनेरितिंग गतिविधियों के अवलोकन , मार्गदर्शन हेतु मेनेजर पाण्डेय द्वारा किये गए सर्वे से लगा कि इस आवधारनासे होशंगाबाद जिले की हजारों महिलाओं में न केवल आत्म विश्वास पैदा हुआ बल्कि इन स्माल लोन ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया , बेदर्द समाज और अभावों के बीच कुछ कर दिखाना आसान नहीं पर इन महिलाओं के होसले बुलंद है .....
होशंगाबाद के मलाखेदी में एक खपरेल मकान में चाक पर घड़े को आकार देती ३० साल की बिना पदीलिखी लखमी प्रजापति को भान भी नहीं होगा कि वह अपनी जैसी उन हजारों महिलाओं के लिए उदाहरन हो सकती है जो अभावों के आगे घुटने टेक देती है , दो बच्चों की माँ ल्क्स्मी ने जब देखा कि रेतमजदूर पति की आय से कुछ नहीं हो सकता तो उसने बचपन में अपने पिता के यहाँ देखा कुम्हारी का काम करने का सोचा , काम इतना आसान नहीं था लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, महीनों की लगन के बाद उसने ये काम सीखा और आज वह दो सो रूपये रोज कमा रही है इस प्रकार स्व सहयता समूह से जुड़ कर अपने परिवार का उन्नयन कर देवर की शादी का खर्चा भी उठाया , बच्चे इंग्लिश स्कूल में जाने लगे है ...... शमा विशकर्मा भी ऐसी ही जीवत वाली महिला है जिसने बिना पदेलिखे रहते हुए भी haar नहीं मानी और अपने पेरों पर खड़ी हो गई , वह बताती है कि पहले रेशम केंद्र में मजदूरी करने जाती थी तो ७०० / मिलते थे लेकिन एक दिन युक्ति समाज ने रेशम कत्त्ने की मशीन का लोन दिया तो मशीन घर आ गई मशीन घर पर होने से यह फायदा हुआ कि काम के घंटे ज्यादा मिल गए और वह ३०००/ से ज्यादा कमाने लगी है ..... अंधियारी गाँव की मंजू चौधरी और बेरखेडी गाँव की लाक्स्मी ने तो सहकारिता की वह मिसाल पेश की जिसकी जितनी तारीफ की jaay कम है , गाँव की अपने जैसी दस मलिलाओं ने स्व सहयता समूह बनाकर लोन लिया फिर सिकमी (लीज) पर खेती कर रहीं है समूह की सब महिलाएं खेतों में हल चलने के आलावा वह सब काम भी करती है जो अभी तक पुरुस करते थे ........इन सब महिलाओं का कहना है कि ....गरीबी अशिक्छा कुपोषण आदि की समस्याओं से सब कुछ डूबने की निराश भावना से उबरने के लिए जरूरी है कि गाँव एवं शहरों में हो रहे बदलाव का सकारात्मक रूख उजागर किया जाए .........
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जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फायनेंस शाखा भोपाल

SAMAY OT BALWAN

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक ,चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक , कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जातसदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात
कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।
समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैंं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
अब सिटिजन एस बी आई ने आपको जगाया है .... '' तो मत चूको चोहान '' अब जीवन के बचे समय को अपना बना लो ...... '' काल करे तो आज कर , आज करे तो अब '' की ओज भरी भावना से खुद को सवारों , समाज को कुछ अच्छा दो , देश के लिए कुछ अच्छा कर के दिखा दो ........... जय राम जी की ................

EK ROCHAK PAHAL

पन्ना जिले के गुनौर विकासखण्ड में छोटा सा ग्राम है ‘‘बम्हौरी’’ । लगभग डेढ़ सौ परिवारों वाले इस ग्राम के ग्रामीण मुख्यतः खेतिहर मजदूरी एवं मजदूरी पर ही निर्भर हैं। घर गृहस्थी एवं चूल्हा चौका सम्भालती महिलाएं कभी कभार मजदूरी पर जाकर परिवार की आर्थिक जरुरतों को पूरा करने मे सहयोग करतीं लेकिन अक्सर ऐसा होता कि जब भी कोई बीमार हो गया या मेहमान आ गया या त्योहार आया घर मे खर्च करने के लिए फूटी कौड़ी भी न होती।

ऐसे मे राजपूत मुहल्ले की कुछ महिलाओं को तेजस्विनी कार्यक्रम की जानकारी हुई एवं आपसी सलाह करके 17 सखी सहेलियों ने ठान लिया मुष्किलों एवं परेषानियों से स्वयं ही लोहा लेने एवं कुछ नया कर गुजरने का। इस तरह गठित हुआ ‘‘रजनी तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह’’।

प्रत्येक बैठक मे समूह की समस्त गतिविधियां संचालित करने के साथ- साथ किसी एक सामाजिक समस्या या व्यवस्था पर अवष्य ही चर्चा होती ऐसे ही नीम चबूतरे पर आयोजित बैठक मे मुद्दा था बच्चों की पढ़ाई का राधा बाई का कहना था मेरे बच्चे एक घण्टे मे ही स्कूल से लौट आतें हैं तो मीरा का कहना था कि मेरी बेटी को स्कूल मे खाना नही मिलता और पार्वती बोली कि मास्टर साहब समय से स्कूल नही आते। तय हुआ कि क्यों न आज स्वयं स्कूल मे चलकर देखा जाए कि हमारे बच्चे आखिर किस तरह पढ़ लिख रहे हैं और लगभग दस मिनट मे ही महिलाओं का काफिला पहुंच गया स्कूल मे।

स्कूल का नजारा देखकर सब के सब चकित! मास्टर साहब कक्षाओं मे नही, बच्चे धूल मे खेल रहे थे और लड़झगड़ रहे थे, किताबें फैली पड़ी थीं और पानी आदि की कोई व्यवस्था नही थी। स्कूल स्टाफ ने पहली बार स्कूल मे इतनी महिलाओं को देखा तो उन्हे सूझा ही नही कि वे क्या करें, फिर आनन - फानन मे सभी कक्षाओं की ओर भागे। महिलाओं ने एक - एक क्लास को देखा, मध्यान्न भोजन व्यवस्था देखी, पानी पीने का स्थान देखा और पाया कि सब कुछ अव्यवस्थित है यहां तक कि स्कूल मे छात्र छात्राओं के लिए पेषाबघर भी नही है। स्कूल की सारी अव्यवस्थाओं के लिए स्कूल स्टाफ विस्तृत बात की एवं अगले भ्रमण तक व्यवस्थाओं को सुधारने का निवेदन किया। स्कूल स्टाफ को महिलाओं का व्यवस्थाओं को सुधारने का यह तरीका काफी प्रभावषाली लगा एवं उन्होंने व्यवस्थाओं को सुधारने का वचन दिया।

समूह की अगली बैठक मे महिलाओं ने पुनः स्कूल का भ्रमण किया और पाया कि व्यवस्थाएं पूर्णतया ठीक तो नही हुईं लेकिन आंषिक सुधार अवष्य आया है जैसे कि षिक्षक समय पर स्कूल आ चुके थे कक्षाएं चल रहीं थीं और मध्यान्न भोजन बनाया जा रहा था। महिलाओं को पूर्ण सन्तुष्टि तो नही मिली लेकिन अपनी संगठन शक्ति की सफलता का विष्वास जरुर हो गया। इसी विष्वास के दम पर वे कहतीं हैं कि हम भले ही न पढ़ सके पर बच्चों को जरुर पढ़ाएंगें और धीरे - धीरे एक दिन जरुर वे गांव की सारी व्यवस्थाओं को सुधार पाने मे सफल हो सकेंगीं।

JAI PRAKASH PANDEY
MICRO FINANCE BRANCH
Bhopal