Thursday, June 29, 2023
पिता
कविता ,
" पिता "
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पिता बैठते हैं कभी
इधर और कभी उधर,
कभी अमरूद के नीचे
कभी परछी के किनारे
कभी खोलते हैं कुण्डी
फिर बंद करते हैं किवाड़
गाय को डालते चारा
बछिया को दूध पिलाते
लौकी की बेल पकड़ लेते
फिर खीरा तोड़ ले आते
अम्मा पर चिल्लाने लगते
आंगन के कचरे से चिढ़ते
चिड़ियों को दाना डाल देते
कभी चिड़चिड़े हो रोने लगते
बरसते पानी में भीगने लगते
पिता हर जगह मौजूद रहते खांसते और छींकते हुए
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जय प्रकाश पांडेय
Sunday, June 11, 2023
परसाई से साक्षात्कार
ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई से व्यंग्यकार जय प्रकाश पाण्डेय की बातचीत के अंश--
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1993 में जय प्रकाश पाण्डेय ने परसाई जी का साक्षात्कार लिया था।यह साक्षात्कार उनके जीवन का अन्तिम साक्षात्कार माना जाता है ।
परसाई जी से सवाल--
जय प्रकाश पाण्डेय--
विश्व के प्राय: सभी महान लेखक कथा का सहारा लेते रहें हैं,स्केलेटन के रूप में क्यों न सही ।आप एक ऐसे लेखक हैं जो अपनी उत्तरोत्तर बढ़ती लोकप्रियता के समान्तर सदियों से आजमाये इस हथियार को लगातार छोड़ते चले गए। आपने अपना साहित्यिक कैरियर कथाकार के रूप में शुरू किया, किन्तु कालान्तर में आप कथा की दुनिया छोड़ निबंधों की ओर मुड़ गये, अपने इस जोखिम भरे विकास क्रम पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेंगे ?
हरिशंकर परसाई--
हां, कथा बहुत रोचक होती है और उसके पाठक सबसे अधिक होते हैं। ये भी सही है कि महान साहित्य या तो महाकाव्य में लिखा गया है या उपन्यासों में या कहानियों में। आरंभ में मैंने भी कहानियां लिखीं, उससे मुझे लोकप्रियता भी प्राप्त हुई, कहानियां मैं लगातार लिखता रहा, अभी अभी भी मैं अक्सर कहानी लिख लेता हूं, मेरी करीब 350 कहानियां हैं, परन्तु मुझे इसकी चिंता नहीं कि किस विधा में लिख रहा हूं या मैं उस विधा के नियम मान रहा हूं या नहीं मान रहा हूं। कुछ लोग कहते भी थे कि ये लिखते हैं कहानियां, लेकिन ये कहानी की परिभाषा में नहीं आता.....तो मैं उनसे कहता था कि आप कहानी की परिभाषा बदल दीजिए,इस प्रकार मैंने इन विधाओं के स्ट्रक्चर को उनकी बनावट को भी तोड़ा और परम्परा से जो रीति चली आ रही थी उसको भी मैंने एक नये प्रकार से तोड़ा।
मेरे सामने जो समस्या थी वह कहानी या उपन्यास लिखने की समस्या नहीं थी, और न अभी है। मेरे सामने जो समस्या शुरू से रही है वह यह कि इस पूरे समाज का सर्वेक्षण करके,जीवन को समझकर,जीवन की समीक्षा जो मैं कर रहा हूं, इस समीक्षा के लिए कौन सा माध्यम सबसे उपयोगी होगा तो मुझे लगा निबंध एक बहुत अच्छा माध्यम है इसके लिए। क्योंकि निबंध में स्वतंत्रता होती है। मेरे निबंध न ललित निबंध हैं, जैसा कि आमतौर पर लिखे जाते हैं,वे ठोस विषयों पर लिखे हुए होते हैं, और ठोस परिणति तक पहुंचते हैं। जैसा कि क्रून्सी ने कहा है - "आइडियल शैली आफ माइन्ड" वे भी नहीं हैं वो ।इन निबंधों में मैंने जिस विषय को उठाया है, उसके बहाने मैंने आसपास बिखरे दसों पच्चीसों विषयों पर तिरछे प्रहार किए हैं....तो निबंधों में स्वतंत्रता बहुत होती है।ये नहीं कि कथा यहां अटक गई है उसे अटकना नहीं चाहिए, उसे चलना ही चाहिए। मैं निबंध में एक स्थान पर रुककर किसी दूसरे विषय पर भी व्यंग्य कर देता हूं, तो ये सुभीता व्यंग्य में है। मेरे व्यंग्य भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितनी कहानियां.... इसीलिए मैंने व्यंग्य को अपनाया।उसी प्रकार उपन्यास को ले लीजिए ,लघु उपन्यास भी मैंने लिखे।एक तो "तट की खोज" यह देवकथा है । ये लंबी कहानी है,इस लघु उपन्यास में व्यंग्य नहीं है।यह वास्तव में अत्यंत करुण कहानी है, एक लड़की की करुण कहानी है। लेकिन दूसरा जो मैंने लघु उपन्यास लिखा "रानी नागफनी की कहानी" वह पूरा का पूरा व्यंग्य है।उस व्यंग्य में मैंने एक वर्ग को लिया है।एक मामूली सा प्रेम प्रसंग के बाद मैंने देश की समस्याएं और विश्व की समस्याएं, ये सब की सब उसमें मैं व्यंग्य के द्वारा ले आया हूं, और पुस्तक मात्र 130-140 पेज की है, उसमें पूरे विश्व की समस्याएं ले ली गईं हैं। इसमें पूरा-पूरा व्यंग्य है। तो इस प्रकार के उपन्यास मैं लिख सकता हूं, लेकिन परंपरागत उपन्यास जो हैं उनको लिखना मेरे वश की बात नहीं है। मैं फेन्टेसी लम्बी लिख सकता हूं, हां फेन्टेसी उपन्यास... जैसा कि स्पेनिश लेखक सर्वेन्टीस का है "डान की होट" जिसमें एक सामंत है,वह पगला है और उसका एक पिछलग्गू है और वह भी पगला गया है। और उनके द्वारा लेखक ने यूरोप के सामंतवाद का उपहास किया है। ऐसी लम्बी फेन्टेसी या ऐसा लंबा फेन्टेसी उपन्यास मैं लिखना चाहता था, इसके छह चेप्टर मैंने एक पत्रिका में सीरियलाइज किेए, लेकिन छह केबाद वह पत्रिका ही बंद हो गई (हंसते हुए..)अब छैह के छैह वैसे ही रखे हुए हैं, मैं उसको पूरा नहीं कर पा रहा हूं, इस प्रकार मैं उपन्यास लिखना चाहता था पर नहीं लिख सका।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपका व्यक्तिगत जीवन प्रारंभ से ही नाना प्रकार के हादसों और ट्रेजिक स्थितियों से घिरा होने के कारण बहुत संघर्षपूर्ण ,अनिश्चित व असुरक्षित रहा है,इस प्रकार का जीवन जीने वाले व्यक्ति के लेखन का स्वाभाविक मार्ग, सामान्य तौर पर दास्तोएव्सकी और मुक्तिबोध का मार्ग होना चाहिए, जबकि व्यक्तिगत जीवन के ठीक विपरीत आपके लेखन में अगाध आत्मविश्वास यहां तक कि विकट विजेता भाव के दर्शन होते हैं। दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध की तरह आप जीवन के डेविल फोर्सेस का आतंक नहीं रचते,वरन् इनका विद्रूपीकरण करते हैं,इनका मजाक उड़ाते हैं, इन्हें हास्यास्पद बनाते हुए इनकी दुष्टता व क्षुद्रता पर प्रहार करते हैं। कहने का आशय यह है कि अंतहीन आतंककारी स्थितियों, परिस्थितियों के बीच लगातार बने रहते हुए आपने जिस तरह का लेखन किया है उसमें उस असुरक्षा भाव की अनुपस्थिति है जो दोस्तोवस्की वह मुक्तिबोध के लेखन की केन्द्रीय विशेषताओं में से एक है,इस दिलचस्प "कान्ट्रास्ट"पर क्या आपने स्वयं भी कभी विचार किया है ?
हरिशंकर परसाई---
देखिए..एक तो ये है कि दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध में भेद करना चाहिए।यह सही है कि दोस्तोवस्की ने रूसी समाज एवं रूसी मनुष्य के दिमाग के अंधेरे से अंधेरे कोने को खोजा है और उस अंधेरेपन को उन्होंने चित्रित किया है तथा बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। क्रूरता, गरीबी, असहायता,कपट और छल आदि जो रूसी समाज की बुराईयां हैं वे सब की सब दोस्तोवस्की के लेखन में हैं। टालस्टाय ने इन्हें ईवीजीनियस कहा है।अब उनके पास इन सब स्थितियों को स्वीकारने के सिवाय,उन पर दुखी होने के सिवाय और लोगों का कुछ भला करने की इच्छा के सिवाय कोई और उनके पास आशा नहीं है और न उनके पास मार्ग है। एक तो वे स्वयं बीमार थे,मिर्गी के दौरे उनको आते थे,जुआ खेलने का भी शौक था, उनके बड़े भाई को फांसी हो गई थी, जारशाही ने फांसी दे दी थी।वे खुद दास्वासेलिया में रहे थे,कष्ट उन्होंने बहुत सहे लेकिन उनके सामने कोई रास्ता नहीं था। जैसे उनके उपन्यास 'इडियट' मेंं जो प्रिंस मुस्की है वो सबके प्रति दयालु है और सबकी सहायता करना चाहता है,सबका भला करना चाहता है,जो भी दुखी है पर किसी का भला नहीं कर सकता,उस सोसायटी में भला नहीं कर सका। विश्वास उनके क्या थे ? वास्तव में उनके पास पीड़ा थी, दर्द था,वे अपने समाज की सारी बुराईयों को,अनीतियों को समझते थे, लेकिन विश्वास नहीं था उनके पास। और दूसरा यह कि कर्म नहीं था, और संघर्ष नहीं था। उनके पात्र स्थितियों को स्वीकार कर लेते हैं,कर्म और संघर्ष नहीं करते। एकमात्र उनका संबल जो था वह कैथोलिक विश्वास था, तो मोमबत्ती जलाकर ईश्वर की प्रार्थना कर ली, ये नियतिवाद हुआ,भाग्यवाद हुआ, संघर्ष कदापि नहीं हुआ।
मुक्तिबोध की चेतना में अपने युग में सभ्यता का जो संकट था उसकी समझ बहुत गहरी थी, एक पूरी मनुष्य जाति की सभ्यता के संकट को वे समझते थे। उससे दुखी भी वे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अंधेरे का चित्रण किया है, ये सही है उन्होंने विकट परिस्थितियों का चित्रण किया है, उन्होंने टूटे हुए लोगों का चित्रण किया है, और पीड़ित लोगों एवं पीडिकों का भी चित्रण किया है, लेकिन इसके साथ साथ मुक्तिबोध में आशा है और वे विश्वास करते हैं कि कर्म से, संघर्ष से ये हालात बदलेंगे।इस विश्वास का कारण क्या है ? इस विश्वास का कारण है उनका एक ऐसे दर्शन में विश्वास, जो कि मनुष्य के जीवन को सुधारने के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाता है।
दोस्तोवस्की के पास ऐसा दर्शन नहीं था। कैथोलिक फेथ में तो भाग्यवाद होता है,कर्म नहीं होता, इसीलिए उन्होंने जगह जगह जहां बहुत गहरा अंधेरा चित्रित किया है, मुक्तिबोध ने कहीं न कहीं एक आशा की किरण प्रगट कर दी है।
इस तरह उनके काव्य में संघर्ष, आशा और समाज पलटेगा, स्थितियां बदलेंगी ये विश्वास मुक्तिबोध के अन्दर है,इस कारण दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध में फर्क है क्योंकि दोस्तोवस्की ने पतनशीलता स्वीकार कर ली है और मुक्तिबोध ने उस अंधेरे को स्वीकार नहीं किया है, ये माना है कि ये कुछ समय का है और इतिहास का एक फेस है यह, तथा संघर्षशील शक्तियां लगी हुई हैं जो कि इसको संघर्ष करके पलट देंगी,बदल देंगी,ऐसी आशा मुक्तिबोध के अन्दर है। जहां तक मेरा सवाल है मैंने दोस्तोवस्की को भी बहुत ध्यान से लगभग सभी पढ़ा है, मुक्तिबोध को भी पढ़ा है। मेरे विश्वास भी लगभग मुक्तिबोध सरीखे ही हैं, इसमें कोई शक नहीं है, इसीलिए निराशा या कर्महीनता मेरे दिमाग में नहीं है, मैंने एक तो क्या किया कि अपने को अपने दुखों से, अपने संघर्षों से, अपनी सुरक्षा से, अपने भय से, लिखते समय अपने आपको मुक्त कर लिया और फिर मैंने यह तय किया कि ये सब स्थितियां जो हैं,इनका विद्रूप करना चाहिए,इनका उपहास उड़ाना चाहिए, उनसे दब नहीं जाना चाहिए, तो मैं उनसे दबा नहीं। मैंने व्यंग्य से उनके बखिया उधेड़े,उनका मखौल उड़ाया, चोट की उन पर गहरी। इसमें मेरा उद्देश्य यह था कि समाज अपने को समझ ले कि हमारे भीतर ये ये कुछ हो रहा है। इसमें मेरा उद्देश्य ये रहा है कि समाज आत्म साक्षात्कार करे, अपनी ही तस्वीर देखे और उन शक्तियों को देखे,उन काली शक्तियों को समझे जिन काली शक्तियों को मैंने विद्रूप किया है,उन पर व्यंग्य किया है और जिन पर सामयिक मखौल उड़ाया है,उन स्थितियों के साथ मेरा ट्रीटमेंट जो है वह इस प्रकार का है जो कि मुक्तिबोध और दोस्तोवस्की इन दोनों से अलग किस्म का...।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपना साहित्यिक कैरियर कथाकार के रूप में शुरू किया, प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले एक समर्थ कथाकार के रूप में समादृत भी हुए, फिर कालान्तर में आप कथा की दुनिया छोड़ निबंधों की दुनिया में चले गए, अपने इस जोखिम भरे विकास क्रम पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
हरिशंकर परसाई--
इसमें कोई जोखिम नहीं था, मेरे निबंध भी उतने ही लोकप्रिय हुए और मेरी कहानियां भी खूब लोकप्रिय हुईं। मुझे अभिव्यक्ति के लिए और स्वतंत्रता चाहिए थी और वह माध्यम मुझे निबंध लगा,यही मुझे अनुकूल लगा और मैंने उसे ग्रहण कर लिया।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपके बहुत सारे पाठकों-प्रशंसकों से की प्रबल इच्छा रही है कि छोटे-आकार-प्रकार वाले लेखों-टिप्पणियों में जिनमें स्तम्भ लेखन भी शामिल है, से मुक्त होकर अब आपको कोई बड़ा उपन्यास या नाटक या ऐसी ही कोई और चीज लिखनी चाहिए, कोई ऐसी रचना जिसमें समकालीन जीवन अपेक्षाकृत अधिक विविधता और सम्पूर्णता के साथ एक जगह चित्रित हो सके, इस इच्छा में क्या आप स्वंय को भी शामिल मानते हैं ?
हरिशंकर परसाई--
हां, मुझसे अपेक्षा तो बहुत पहले से की जा रही है, मैं उस तरह का उपन्यास,जिसको परंपरागत उपन्यास कहते हैं,उसको तो नहीं लिख सकता। मुझमें वह टेलेंट नहीं है और जैसा कि मैंने आपसे कहा कि मैं एक फेन्टेसी उपन्यास लिख सकता हूं, जिसमें सभी क्षेत्र आ जावें जीवन के, और कोशिश भी कर रहा था उसके लिए.....अब इस अवस्था में जबकि मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता, क्षीणता भी आ गई है, मैं उतनी मेहनत भी नहीं कर पाता....उम्र भी 71 साल के लगभग हो रही है, मैं कोई उपन्यास बड़ा लिख सकूंगा उसकी मुझे अभी संभावना तो नहीं दिखती है।हो सकता है कि कुछ परिस्थितियां पलटें और मैं लिखूं। लिखना जरूर चाहता हूं, लेकिन फिर या तो किसी व्यक्ति को लेकर, उसके जीवन पर आधारित उपन्यास, जिसमें और भी बहुत से पात्र आ जावेंगे, उसमें समाज का चित्रण हो सकेगा या फिर वौ एक लम्बी फेन्टेसी होगी उपन्यास के रूप में। मैं आशा करता हूं कि जैसी अपेक्षा है मुझसे,इस तरह का एक बड़ा उपन्यास लिखूं......
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपके गद्य लेखन को व्यंगमूलक मानने के बावजूद इधर कुछ महत्वपूर्ण आलोचकों ने उसमें भाव के प्रामाश्य को रेखांकित किया है। व्यंग्य मूलतः एक आक्रामक या संहारक रचना शैली है, इसमें करुणा जैसे विरोधी भाव का अंतरयोग सिद्धांतत: बहुत कठिन है। व्यंग्य की रचना शैली के विशिष्ट अनुशासन के भीतर आप करुणा भाव को कैसे चरितार्थ कर पाते हैं ?
हरिशंकर परसाई---
ऐसी स्थितियां होतीं है जो करुण स्थितियां होती हैं, मेरी रचनाओं में आयी हैं। जैसे कि "अन्न की मौत" मेरा एक निबंध है, उसमें जब बहुत कठिनाई है आटा मिलने में, तो कहीं से मुझे आधा बोरा आटा मिल जाता है,जब उसे खोलते हैं तो उसमें मरा हुआ चूहा निकलता है,तो हम भाई-बहन चारों उस बोरे के आसपास बैठ जाते हैं और हमें याद आता है कि जब हमारे चाचा मरे थे तब भी हम इसी तरह बैठे थे, तो ये "अन्न"मरा है।तब भी हम इसी तरह बैठे हैं।अब ये स्थिति तो बहुत करुण है...न...। ये बहुत करुण स्थिति है, लेकिन मैंने पूरे के पूरे निबंध को जिस स्थिति में लिखा उसमें व्यंग्य ही व्यंग्य आता है।उस बोरे के आसपास उदास बैठना, इसमें कुछ विनोद ही ज्यादा है, फिर मैंने लिखा है कि "यहां तो अमेरिका से आयेगा गेहूं, तब मिलेगा" ।
फिर एक वाक्य है- "इस देश के बच्चे बच्चे को पानी के जहाजों के आने का टाइम टेबल मालुम हो जाता है"। इस तरह के वाक्य हैं उसमें।
तो बहुत करुण परिस्थिति के बीच ये व्यंग्य निकल आता है इस तरह का। यह व्यंग्य जो होता है वह उन परिस्थितियों के ऊपर होता है जिसके कारण वो करुणा पैदा हुई है कोई परिस्थितियां हैं ऐसी जिसके कारण वह करुणा पैदा हुई है।
तो मैं ये मानता हूं कि व्यंग्य में करुणा ही अन्तर्धारा होती है, यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूं, ये बात सही है पर वास्तव में मैं बहुत दुखी आदमी हूं, दुःखी होकर लिखता हूं.... मैं इसीलिए दुःखी हूं कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, मेरे लोगों का क्या हाल है, मनुष्य का क्या हाल होता जा रहा है, ये सब दुख मेरे भीतर हैं, करुणा मेरे भीतर है.... मैं बहुत संवेदनशील आदमी हूं,इस कारण से करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती है।इस प्रकार जैसे में विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूं,उसी प्रकार उस करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूं या उन पर विनोद करता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय---
यह माना जाता है कि सामाजिक-राजनैतिक रूप से जागरूक और मानसिक-वैचारिक रूप से परिपक्व भाषा-समाज में ही श्रेष्ठ व्यंग्य लेखन संभव है। बंगला व मलयालम में इसकेे बाबजूद व्यंग्य लेखन की कोई समृद्ध परंपरा नहीं है, जबकि अपेक्षाकृत अशिक्षित व पिछड़े हिन्दी भाषा समाज में इसकी एक स्वस्थ व जनधर्मी परम्परा कबीर के समय से ही दिखाई पड़ती है। आपकी दृष्टि में इसकेे क्या कारण है ?
हरिशंकर परसाई__
हां, आपका यह कहना ठीक है कि बंगला और मलयालम में व्यंग्य की एक समृद्ध परंपरा नहीं है, और न व्यंग्य है, जहां तक मैं जानता हूं। पर यह कहना कि एक बड़ी परिष्कृत भाषा में ही व्यंग्य बहुत अच्छा होता है या होना चाहिए, इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। देखिए लोकभाषा में बहुत अच्छा व्यंग्य विनोद होता है। आपने बुंदेलखंडी के व्यंग्य विनोद अवश्य सुनें होंगे। आपस में लोग बातचीत करते करते व्यंग्य विनोद करते हैं, कितने प्रभावशाली होते हैं, अब वह तो लोकभाषा है, आधुनिक भाषा रही नहीं, आधुनिक भाषा तो खड़ी बोली हिन्दी है।
लोकभाषा में बहुत अच्छा व्यंग्य, बहुत अच्छा विनोद होता है, तो मैं समझता हूं कि भाषा किसी भी प्रकार से इसमें बाधक नहीं है। आवश्यकता है व्यंग्य चेतना की।
किसी भाषा के लेखकों में व्यंग्य चेतना अधिक होगी तो वे व्यंग्य अधिक लिखेंगे। लोकभाषा बुंदेली में या भोजपुरी में लोग बात बात पर व्यंग्य करते हैं, बात बात में विनोद करते हैं, तो उन लोगो की कहने की शैली भी व्यंग्यात्मक हो गई है। यद्यपि लोकभाषा में व्यंग्य अधिक लिखा नहीं गया है पर वे व्यंग्य करते हैं, विनोद करते हैं। हिंदी वैसे नयी भाषा है, बहुत समृद्ध नहीं, पर इसमें कबीरदास की भाषा से तो हिंदी शायद न भी कहीं चूंकि वह बहुत प्रकार के मेल से बनी भाषा है। उन्होंने भाषा को तोड़फोड़ कर ठीक-ठाक कर लिया है, विद्रोही थे वे। कबीर दास में व्यंग्य है। आधुनिक भाषा हिन्दी में व्यंग्य की परंपरा है, भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अलावा 'मतवाला' जो पत्र निकलता था उसमें उग्र, मतवाला, निराला वगैरह काम करते थे। उसमें बहुत व्यंग्य है। उसकी फाइल उठाकर देखिए उसमें व्यंग्य ही व्यंग्य है। प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त वगैरह व्यंग्य के कालम लिखते थे, जैसे मैं भी व्यंग्य के कॉलम लिखता हूं। तो परंपरा है ही, उसी परंपरा में नवयुग की चेतना के अनुकूल और अपनी शैली से उसमें और जुड़कर तथा परंपराओं को तोड़कर मैंने व्यंग्य लिखा और हिंदी में व्यंग्य, लिखने वाले बहुत अधिक हैं, इसमें कोई शक नहीं, किसी अन्य भाषा में इतने अधिक नहीं होंगे शायद।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपनी कोई भी पुस्तक प्रकाशित रुप में कभी किसी को समर्पित नहीं की, जबकि विश्व की सभी भाषाओं में इसकी अत्यंत समृद्ध परंपरा मिलती है।आपके व्यक्तित्व व लेखन दोनों की अपार लोकप्रियता को देखते हुए यह बात कुछ अधिक ही चकित करती है ?
हरिशंकर परसाई------
यह समर्पण की परंपरा बहुत पुरानी है। अपने से बड़े को, गुरु को, कोई यूनिवर्सिटी में है तो वाइस चांसलर को समर्पित कर देते हैं।कभी किसी आदरणीय व्यक्ति को,कभी कुछ लोग पत्नियों को भी समर्पित कर देते हैं। कुछ में साहस होता है तो प्रेमिका को भी समर्पित कर देते हैं। ये पता नहीं क्यों हुआ है ऐसा।कभी भी मेरे मन में यह बात नहीं उठी कि मैं अपनी पुस्तक किसी को समर्पित कर दूं।जब मेरी पहली पुस्तक छपी, जो मैंने ही छपवाई थी, तो मेरे सबसे अधिक निकट पंडित भवानी प्रसाद तिवारी थे, अग्रज थे, नेता थे, कवि थे,, साहित्यिक बड़ा व्यक्तित्व था, उनसे मैंने टिप्पणी तो लिखवाई किन्तु मैंने समर्पण में लिखा-'उनके लिए,जो डेढ़ रुपया खर्च करके खरीद सकते हैं।ये समर्पण है है मेरी एक किताब में। लेकिन वास्तव में यह है वो- उनके लिए जिनके पास डेढ़ रुपए है और जो यह पुस्तक खरीद सकते हैं, उस समय इस पुस्तक की कीमत सिर्फ डेढ़ रुपए थी।सस्ता जमाना था, पुस्तक भी करीब सवा सौ पेज की थी। इसके बाद मेरे मन में कभी आया ही नहीं कि मैं किसी के नाम समर्पित कर दूं अपनी पुस्तक। जैसा आपने कहा कि मैंने तो पाठकों के लिए लिखा है, तो यह समझ लिया जाये कि मेरी पुस्तकें मैंने किसी व्यक्ति को समर्पित न करके तमाम भारतीय जनता को समर्पित कर दी है।
जय प्रकाश पाण्डेय---
आपके लेखन में प्रारंभ से लोक शिक्षण पर बहुत बल है। कई लोगों का मानना है कि इस उद्देश्य के प्रबल आग्रह के कारण आपके लेखन की साहित्यिक महत्ता या गरिमा क्षतिग्रस्त हुई है, आत्म समीक्षा के एकांत क्षणों में क्या आपको भी ऐसा लगता है ?
हरिशंकर परसाई--
एक तो इसका कारण यह हो सकता है कि मैं 10-12 साल शिक्षक रहा हूं, तो जो मेरे अंदर शिक्षक था, वह मरा नहीं या मैं शिक्षक का ही रोल प्ले करता रहा। मेरे लेखन में लोक शिक्षण है और मैं अभी भी ये मानता हूं कि लोक शिक्षण बहुत आवश्यक है, जो देश में वर्तमान हालात चल रहे हैं उसके लिए मैं उसी बात को दोषी मानता हूं कि राजनैतिक दलों ने, ट्रेड यूनियन्स ने, विश्वविद्यालयों ने लोक शिक्षण नहीं कराया। लोगों को शिक्षित नहीं किया गया। वैज्ञानिक दृष्टि नहीं दी गई, तर्क नहीं दिए गए। इतिहास सही ढंग से नहीं समझाया गया। समाज की रचना को ठीक से नहीं समझाया गया। अन्धविश्वासों को नहीं मिटाया गया, पुरानी परंपराओं के प्रति विरक्ति नहीं पैदा की गई। ये लोक शिक्षण होता है जो वास्तव में नहीं हुआ, हमारे देश में लोक शिक्षण नहीं हुआ, इसलिए हम आज भी देख रहे हैं कि हमारे देश के ऊपर संकट ही संकट हैं। लोक शिक्षण दो प्रकार का होता है, एक तो सीधा, स्पष्ट और दूसरा परोक्ष या सांकेतिक। मेरे लेखन में कहीं शायद सीधा डायरेक्ट कोई शिक्षण आ गया हो, कोशिश मैंने यही की है कि परोक्ष रूप से शिक्षण करूं, अपने व्यंग्य के द्वारा या स्थितियों का चित्रण करके मैं रख दूं और उससे पढ़ने वाला शिक्षक हो जावे, ये मैंने कोशिश की। अब इससे मेरे साहित्य की मौलिकता घटी या बढ़ी है, मैं नहीं कह सकता हूं, हो सकता है घटी हो, मान लेता हूं, परन्तु मैं लोक शिक्षण को साहित्य में आवश्यक मानता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय---
ऐसा प्राय: देखने में आया है कि आप अपनी रचना में जहां सबसे मूल्यवान कथ्य का सम्प्रेषण कर रहे होते हैं, वहां बहुत कम देर रुकते हैं, इन क्षणों में आपका गद्य अचानक बहुत संक्षिप्त और उसकी गति अत्याधिक त्वरित हो उठती है। एक लेखक के रूप में अपने इन उत्कर्ष क्षणों में स्वंय को सचेत रूप में अनुपस्थित कर देने का यह गुण आपकी मानवीय विनम्रता का सहज गुण है या सयास निर्मित एक रचना कौशल ?
हरिशंकर परसाई---
यह मेरी विनम्रता नहीं है,बात असल में ये है कि ये कौशल भी नहीं है। मैं वास्तव में उस बिंदु तक आते-आते परिस्थितियों का, वक्तव्यों का ऐसा वातावरण निर्मित कर लेता हूं कि उनमें से इस प्रकार की अभिव्यक्ति निकलनी ही चाहिए,जो कि निष्कर्ष रूप में होती है, लेकिन उसकी भूमिका मैं लम्बी बनाता हूं, और उस लम्बी भूमिका के बाद उस निष्कर्ष का क्षण आता है, यदि निष्कर्ष के उस क्षण को मैं लम्बा कर दूं तो मेरे लेखन का प्रभाव नष्ट हो जावेगा। मुझे संक्षिप्त में ही उसे एकदम से कहकर आगे बढ़ जाना चाहिए,कारण कि पाठक का दिमाग तो तैयार हो गया तब तक। तो एक दो वाक्य चलते फिरते कह देने भर से वह पूरी की पूरी बात ग्रहण कर लेता है। यदि मैं उसको ४-६-८ वाक्यों में समझाऊं तो इसका मतलब कि मेरी पहले की बनाई भूमिका बेकार हो जावेगीऔर उसका प्रभाव भी नहीं रह पायेगा, इसलिए मैं ऐसा करता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपनी कोई भी पुस्तक प्रकाशित रूप में कभी किसी को समर्पित नहीं की, जबकि विश्व की सभी भाषाओं में इसकी समृद्ध परंपरा मिलती है। आपके व्यक्तित्व व लेखन दोनों की अपार लोकप्रियता को देखते हुए यह बात कुछ अधिक ही चकित और विस्मित करती है?
हरिशंकर परसाई--
यह समर्पण की परंपरा बहुत पुरानी है। अपने से बड़े को, गुरु को, कोई यूनिवर्सिटी में है तो वाइस चांसलर को समर्पित कर देते हैं। कभी किसी आदरणीय व्यक्ति को,कभी कुछ लोग पत्नियों को भी समर्पित कर देते हैं हैं। कुछ में साहस होता है तो प्रेमिका को भी समर्पित कर देते हैं। ये पता नहीं क्यों हुआ है ऐसा। कभी भी मेरे मन में यह बात नहीं उठी कि मैं अपनी पुस्तक किसी को समर्पित कर दूं, जब मेरी पहली पुस्तक छपी, जो मैंने ही छपवाई थी, तो मेरे सबसे अधिक निकट पंडित भवानी प्रसाद तिवारी थे, अग्रज थे, नेता थे, कवि थे, साहित्यिक बड़ा व्यक्तित्व था, उनसे मैंने टिप्पणी तो वह लिखवाई किन्तु मैंने समर्पण में लिखा- "उनके लिए, जो डेढ़ रुपया खर्च करके खरीद सकते हैं।"
तो ये समर्पण है मेरी एक किताब में।
लेकिन वास्तव में यह है वो - उनके लिए जिनके पास डेढ़ रुपया है और जो यह पुस्तक खरीद सकते हैं,उस समय इस पुस्तक की कीमत सिर्फ डेढ़ रुपए थी।सस्ता जमाना था, पुस्तक भी करीब सवा सौ पेज की थी। इसके बाद मेरे मन में कभी आया ही नहीं कि मैं किसी के नाम समर्पित कर दूं। अपनी पुस्तक,जैसा आपने कहा कि मैंने तो पाठकों के लिए लिखा है, तो यह समझ लिया जाये कि मेरी पुस्तक मैंने किसी व्यक्ति को समर्पित न करके तमाम भारतीय जनता को समर्पित कर दी है।
Friday, June 9, 2023
व्यंग्य - मूर्ति की महिमा
व्यंग्य - - -
"मूर्ति की महिमा "
विरोध करने की उनकी जन्मजात आदत थी तो हर बात में विरोध करने में उनको संकोच नहीं होता था। वे निंदा करते समय बड़ी सतर्कता से निंदा करते थे, उनका मानना था कि आपला मानुष ज्यादा विश्वासपात्र होता है और निंदा करने की प्रेक्टिस वहीं से की थी।अपने वार्ड के पार्षद के आगे पीछे घूम घूम कर और पूंछ हिलाने की प्रेक्टिस करके उन्होंने अपने आपको नेतागिरी लायक बना लिया था और अपने पार्षद के विश्वासपात्र बन गए थे पार्षद ने पेंट पहनना भी सिखा दिया था और परेड करना भी। जनता की सेवा के चक्कर में नेताओं का दिल कमजोर हो जाता है एक दिन पार्षद जी का हार्ट फट गया राम जी को प्यारे हो गए, और इनको पार्षद की टिकिट मिल गई और धोखे से जीत भी गये। राम मंदिर के लिए ईंट लेकर अयोध्या गये वहां पिट गये इज्जत बचाने शहर लौटे तो अखबार में फोटो - ओटो छपवाकर अयोध्या रिटर्न कहलाने लगे। सुबह शाम चौराहे में खड़े होने लगे सबसे नमस्ते करने लगे। अपनी पार्टी के लोगों को छुड़ाने थाने भी जाने लगे। पार्टी में सक्रिय नेता के रूप में पहचान सी होने लगी, विधायक प्रतिनिधि बनकर विधायक की सीडी वायरल करा दी फिर विधायक भी बन गये। सांसद बनने के चक्कर में राजधानी दौड़ने लगे आपला मानुष की तलाश में राजधानी में दिल दे बैठे हार्ट ने साथ नहीं दिया, चल दिए। राम राम सत्य हो गया।
मरे तो उनकी घरवाली को टिकट मिल गई, घरवाली सुंदर थी बड़े नेताओं की नजर लग गई खबर राजधानी तक गई तो चुनाव जीतकर शहर की महापौर की कुर्सी में बैठ गईं। बन-ठन के सड़क पे निकलतीं तो सड़क के गढ्ढे सकुचाते, विकास के होर्डिंग मुस्कराते, राम मंदिर के पुजारी बादाम खाके दण्ड पेलते, मेडम रामभक्त थीं सो सुबह शाम राममंदिर के राम जी को बाहर से सलाम करतीं, पुजारी जी उनको देख कर बादाम और भांग का शर्बत पीने लगते...... पहले वाली बात अलग थी तब मेडम के पास समय रहता था। पुजारी जी के साथ एक बार अयोध्या गईं थीं राम मंदिर जहां बनेगा वो जगह देखने। पुजारी जी सुबह सुबह मंदिर के पीछे दण्ड पेलते थे उसी समय मेडम कार से गुजरतीं। एक दिन अकेले में पुजारी जी ने मेडम को पकड़ लिया कहने लगे अगले चौराहे में अपने नेता जी की प्रतिमा लगनी चाहिए तुम महापौर हो और तुम्हारे पति ने जनता की सेवा की थी तो उनकी मूर्ति तो लगना ही चाहिए। मेडम को पुजारी की बात में वजन लगा शहर भर में मांग उठने लगी। प्रस्ताव पारित हो गया उनके पति की मूर्ति चौराहे में लगाने की मांग उन्होंने मान ली। सर्वे हुआ पता चला उस चौराहे में पचासों साल से राम सीता और देवी की मूर्तियां पहले से विराजमान थीं, मेडम ने अकेले में पुजारी से सलाह मशविरा किया, चुपके-चुपके बात हो गई।
मेडम ने स्वच्छता अभियान चलाया सफाई के बहाने चौराहे की मूर्तियों का जायजा लिया, सामने के मंदिर के हनुमानजी चुपके-चुपके सब देखते रहे। एक हफ्ते बाद राम सीता और देवी की मूर्तियां चोरी चलीं गईं, पुलिस मुस्तैदी से तलाश करने लगी जब तक जयपुर से नेता जी की संगमरमर की प्रतिमा शहर पहुंच चुकी थी पुलिस उसकी व्यवस्था में बैचैन हो गई। मूर्ति अनावरण के लिए मंत्री जी आये मेडम के घर में ही रुक गये रात भर नेता जी की चर्चा चलती रही। सुबह प्रतिमा का अनावरण हो गया मंत्री जी ने नेता जी को महान बताया राम मंदिर निर्माण का माहौल बनाने और जनता की सेवा करने वाला मसीहा बताया, मेडम माईक में रो पड़ीं... माहौल गमगीन हो गया पुजारी जी ने नारा लगाया, "नेता जी ज़िंदाबाद "
चौराहे के बाजू के हनुमान मंदिर में अखण्ड हनुमान चालीसा का पाठ चालू हो गया ।
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जय प्रकाश पाण्डेय
Thursday, June 8, 2023
आमने-सामने
"आमने-सामने"
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देश के जाने-माने व्यंग्यकारों ने विगत दिनों व्यंंग्यकार जय प्रकाश पाण्डेय से सवाल जबाव किए, आमने-सामने में प्रस्तुत हैं, आनलाइन बातचीत के अंश____
व्यंंग्यकार मुकेश राठौर (खरगौन)___
प्रश्न-१,
आप परसाई जी की नगरी से आते है| परसाई जी ने अपनी व्यंग्य रचनाओं में तत्कालीन राजनेताओं,राजनैतिक दलों और जातिसूचक शब्दों का भरपूर उपयोग किया | क्या आज व्यंग्यलेखक के लिए यह सम्भव है या फ़िर कोई बीच का रास्ता है?ऐसा तब जबकि रचना की डिमांड हो सीधे-सीधे किसी राजनैतिक दल,राजनेता या जाति विशेष के नामोल्लेख की|
प्रश्न- २-
कथा के माध्यम से किसी सामाजिक,राजनैतिक विसंगति की परतें उधेड़ना |बग़ैर पंच,विट,ह्यूमर के |ऐसी रचना कथा मानी जायेगी या व्यंग्य?
जय प्रकाश पाण्डेय__
मुकेश भाई, व्यंग्य लेखन जोखिम भरा गंभीर कर्म है, व्यंग्य बाबा कहता है जो घर फूंके आपनो, चले हमारे संग। व्यंग्य लेखन में सुविधाजनक रास्तों की कल्पना भी नहीं करना चाहिए, लेखक के लिखने के पीछे समाज की बेहतरी का उद्देश्य रहता है। परसाई जी जन-जीवन के संघर्ष से जुड़े रहे,लेखन से जीवन भर पेट पालते रहे,सच सच लिखकर टांग तुड़वाई,पर समझौते नहीं किए, बिलकुल डरे नहीं। पिटने के बाद उन्हें खूब लोकप्रियता मिली, उनकी व्यंग्य लिखने की दृष्टि और बढ़ी।लेखन के चक्कर में अनेक नौकरी गंवाई। व्यंंग्य तो उन्हीं पर किया जाएगा जो समाज में झूठ, पाखंड,अन्याय, भ्रष्टाचार फैलाते हैं, व्यंग्यकार तटस्थ तो नहीं रहेगा न, जो जीवन से तटस्थ है वह व्यंंग्यकार नहीं 'जोकर' है। यदि आज का व्यंग्य लेखक तत्कालीन भ्रष्ट अफसर या नेता या दल का नाम लेने में डरता है तो वह अपने साथ अन्याय करता है। आपने अपने सवाल में अन्य कोई बीच के रास्ते निकाले जाने की बात की है, तो उसके लिए मुकेश भाई ऐसा है कि यदि ज्यादा
डर लग रहा है तो उस अफसर या नेता की प्रवृत्ति से मिलते-जुलते प्रतीक या बिम्बों का सहारा लीजिए, ताकि पाठक को पढ़ते समय समझ आ जाए। जैसे आप अपने व्यंग्य में सफेद दाढ़ी वाला पात्र लाते हैं तो पाठक को अच्छे दिन भी याद आ सकते हैं।पर आपके कहने का ढंग ऐसा हो,कि ऐसी स्थिति न आया.......
रहिमन जिव्हा बावरी, कह गई सरग-पताल।
आप तो कह भीतर गई, जूती खात कपाल।
जय प्रकाश पाण्डेय___२
मुकेश जी, व्यंग्य वस्तुत:कथन की प्रकृति है कथ्य की नहीं।कथ्य तो हर रचना की आकृति देने के लिए आ जाता है। आपके प्रश्न के अनुसार यदि कथा के ऊपर कथन की प्रकृति मंडराएंगी तो वह व्यंग्यात्मक कथा का रुप ले लेगी।
व्यंंग्यकार
प्रभाशंकर उपाध्याय (गंगानगर)_
आपने अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर किया। बैंक की अफसरी की। आपकी अभिरूचि व्यंग्य लेखन, काव्य और नाट्य में है। आपको निरंतर ‘ई-अभिव्यक्ति’ में पढता रहता हूं।
आपके संकलन- डांस इंडिया डांस के आवरण पृष्ठ पर एक बिजूका खेत में खड़ा हुआ चित्रित है। कोने में एक किसान अग्नि पर कुछ पका रहा है। इसे देखकर रंगमंच की प्रतीति होती है।
इसके बरबक्स, मेरी जिज्ञासा ‘चुटका’ के बारे में जानने की है, तनिक बताइए ?
जय प्रकाश पाण्डेय__
पंडित प्रभाशंकर उपाध्याय जी ने अपने प्रश्न के माध्यम से पन्द्रह साल पहले का जूनूनी प्रसंग छेड़ दिया,प्रश्न के उत्तर की गहराई में जाने के लिए आपको चुटका परमाणु बिजली घर की लम्बी दास्तान पढ़ना पड़ेगी। जो इस प्रकार है................
पन्द्रह साल पहले मैं स्टेट बैंक की नारायणगंज (जिला - मण्डला) म. प्र. में शाखा प्रबंधक था। बैंक रिकवरी के सिलसिले में बियाबान जंगलों के बीच बसे चुटका गांव में जाना हुआ था। आजीवन कुंआरी कलकल बहती नर्मदा के किनारे बसे छोटे से गांव चुटका में फैली गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता देखकर मन द्रवित हुआ । चुटका गांव की आंगन में रोटी सेंकती गरीब छोटी सी बालिका ने ऐसी प्रेरणा दी कि हमारे दिल दिमाग पर चुटका के लिए कुछ करने का भूत सवार हो गया। उस गरीब बेटी के एक वाक्य ने चुटका परमाणु बिजली घर बनाने के द्वार खोल दिए।
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बैंक वसूली प्रयास ने इस करुण कहानी को जन्म दिया........
आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकवरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... ।
तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है कि चुनाव के बहाने इधर-उधर से पैसा मिले ........ सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... ।
दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खाये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-घाट कूदती फांदती ... टेडी-मेढी पगडंडियों में भूलती - भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... ।
सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गालियाँ बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फैली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।
कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते - खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगढ़ हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और जल्दी पक जायेगी तो ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?
वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा .................
रास्ते में नर्मदा के किनारे अलग अलग साइज के गढ्ढे खुदे दिखे तो जिज्ञासा हुई कि नर्मदा के किनारे ये गढ्ढे क्यों ? गांव के एक बुजुर्ग ने बताया कि सन् 1983 में यहां एक उड़न खटोले से चार-पांच लोग उतरे थे गढ्ढे खुदवाये और गढ्ढों के भीतर से पानी मिट्टी और थोड़े पत्थर ले गए थे और जाते-जाते कह गए थे कि यहां आगे चलकर बिजली घर बनेगा। बात आयी और गई और सन् 2006 तक कुछ नहीं हुआ हमने शाखा लौटकर इन्टरनेट पर बहुत खोज की चुटका परमाणु बिजली घर के बारे में पर सन् 2005 तक कुछ जानकारी नहीं मिली। चुटका के लिए कुछ करने का हमारे अंदर जुनून सवार हो गया था जिला कार्यालय से छुटपुट जानकारी के आधार पर हमने सम्पादक के नाम पत्र लिखे जो हिन्दुस्तान टाइम्स, एमपी क्रोनिकल, नवभारत आदि में छपे। इन्टरनेट पर पत्र डाला सबने देखा सबसे ज्यादा पढ़ा गया..... लोग चौकन्ने हुए।
हमने नारायणगंज में "चुटका जागृति मंच" का निर्माण किया और इस नाम से इंटरनेट पर ब्लॉग बनाकर चुटका में बिजली घर बनाए जाने की मांग उठाई। चालीस गांव के लोगों से ऊर्जा विभाग को पोस्ट कार्ड लिख लिख भिजवाए। तीन हजार स्टिकर छपवाकर बसों ट्रेनों और सभी जगह के सार्वजनिक स्थलों पर लगवाए। चुटका में परमाणु घर बनाने की मांग सबंधी बच्चों की प्रभात फेरी लगवायी, म. प्र. के मुख्य मंत्री के नाम पंजीकृत डाक से पत्र भेजे। पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखे। इस प्रकार पांच साल ये विभिन्न प्रकार के अभियान चलाये गये।
जबलपुर विश्वविद्यालय के एक सेमिनार में परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ काकोड़कर आये तो चुटका जागृति मंच की ओर से उन्हें ज्ञापन सौंपा और व्यक्तिगत चर्चा की उन्होंने आश्वासन दिया तब उम्मीदें बढ़ीं। डॉ काकोड़कर ने बताया कि वे भी मध्यप्रदेश के गांव के निवासी हैं और इस योजना का पता कर कोशिश करेंगे कि उनके रिटायर होने के पहले बिजलीघर बनाने की सरकार घोषणा कर दे और वही हुआ लगातार हमारे प्रयास रंग लाये और मध्य भारत के प्रथम परमाणु बिजली घर को चुटका में बनाए जाने की घोषणा हुई।
मन में गुबार बनके उठा जुनून हवा में कुलांचे भर गया। सच्चे मन से किए गए प्रयासों को निश्चित सफलता मिलती है इसका ज्ञान हुआ। बाद में भले राजनैतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधियों ने अपने अपने तरीके से श्रेय लेने की पब्लिसिटी करवाई पर ये भी शतप्रतिशत सही है कि जब इस अभियान का श्रीगणेश किया गया था तो इस योजना की जानकारी जिले के किसी भी जनप्रतिनिधि को नहीं थी और जब हमने ये अभियान चलाया था तो ये लोग हंसी उड़ा रहे थे। पर चुटका के आंगन में कच्ची रोटी सेंकती वो सात-आठ साल की गरीब बेटी ने अपने एक वाक्य के उत्तर से ऐसी पीड़ा छोड़ दी थी कि जुनून बनकर चुटका में परमाणु बिजली घर बनने का रास्ता प्रशस्त हुआ। वह चुटका जहां बिजली के तार नहीं पहुंचे थे आवागमन के कोई साधन नहीं थे, जहां कोई प्राण छोड़ देता था तो कफन का टुकड़ा लेने तीस मील पैदल जाना पड़ता था। मंथर गति से चुटका में परमाणु बिजली घर बनाने का कार्य चल रहा है। प्रत्येक गरीब के घर से एक व्यक्ति को रोजगार देने कहा गया है जमीनों के उचित दाम गरीबों के देने के वादे हुए हैं,जमीन के कंपनसेशन देने की कार्यवाही हो गई है। चुटका से बनी बिजली से मध्य भारत के जगमगाने की उम्मीदें पूरी होने की तैयारियां चल रहीं हैं।
धन्यवाद उपाध्याय जी,इस बहाने आपने पुरानी यादों को हमसे संस्मरण रूप में लिखवा लिया। आपकी गहराई से पड़ताल और अपडेट जानकारियों के लिए हम आश्चर्यचकित हैं।आदरणीय उपाध्याय जी आपके पास सूक्ष्म दृष्टि और तिरछी नजर है,आप चीजों को सही नाम से बुलाते हैं एवं सही ढंग से पकड़ते हैं। आपने अपने विस्तृत फलक लिए प्रश्न में बहुत सी चीजें सही पकड़ी है, बैंक की नौकरी करते हुए हमने पच्चीसों साल सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़े रहे। लम्बे समय तक एसबीआई आरसेटी के डायरेक्टर के रूप में कार्य करते हुए नक्सल प्रभावित पिछड़े आदिवासी जिले के सुदूर अंचलों के ग़रीबी रेखा से नीचे के करीब 3500-4000 युवक युवतियों का हार्ड स्किल डेवलपमेंट एवं साफ्ट स्किल डेवलपमेंट करके उन्हें रोजगार से लगाकर एक अच्छे नागरिक बनने में सहयोग किया।देश की पहली माइक्रो फाइनेंस ब्रांच के मेनेजर रहते हुए म.प्र.के अनेक जिलों की 90 हजार गरीब महिलाओं को स्वसहायता समूहों के मार्फत वित्त पोषित कर महिला सशक्तिकरण के लिए कार्य किया, ऐसे अनेक उल्लेखनीय कार्य की लंबी लिस्ट है,पर आपने चूंकि अपने प्रश्न के मार्फत छेड़ दिया इसीलिए थोड़ा सा लिखना पड़ा। अन्य भाई इसको पढ़कर आत्मप्रशंसा न मानें, ऐसा निवेदन है।
व्यंंग्यकार ललित लालित्य (दिल्ली)__
१- पांडेय जी आप चुपचाप काम करने वाले व्यंग्यकार हैं जबकि आपके जूनियर कहाँ से कहाँ पहुँच गए ।
२-क्या आप मानते है कि व्यंग्यकार को ईमानदार होना चाहिए,चुगलखोर या ईर्ष्यालु नहीं ?
३-क्या जीते जी व्यंग्यकार मंदिर बनवा कर पूजे जाएं यह कहाँ की भलमान्सियत है ?
जय प्रकाश पाण्डेय__
1- सर जी,लेखन में कोई जूनियर, सीनियर या वरिष्ठ, कनिष्ठ या गरिष्ठ नहीं होता, ऐसा हमारा मानना है। ईमानदारी और दिल से जितना कुछ संभव हो, वही संतुष्टि देता है। यदि कोई कहां से कहां पहुंच भी गया तो खुशी की बात है, उसकी प्रतिभा उसका अध्ययन उसे और ऊपर ले जाएगा।
2- ईमानदार और दीन-दुखी जन जन के साथ खड़ा लेखक ही असली व्यंंग्यकार कहलाने का हकदार है, जैसे आप हर दिन आम आदमी की दैनिक जीवन में आने वाली विसंगतियों और पाखंड पर रोज लिखकर आम आदमी के साथ खड़े दिखते हो। समाज की बेहतरी के लिए व्यंंग्यकार की ईमानदार कोशिश होनी चाहिए, ईमानदार प्रयास ही इतिहास में दर्ज होते हैं, फोटो और बोल्ड लेटर के नाम पानी के बुलबुले हैं। भाई,व्यंंग्यकार ही तो है जो जुगलखोरी और ईर्षालुओं के विरोध में लिखकर उनके चरित्र में बदलाव की कोशिश करता है।
3- ऐसे लोगों को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए जो आत्म प्रचार और आत्ममुग्धता के नशे में जीते जी मंदिर बनवाने की कल्पना करते हैं। ऐसे लेखक के अंदर खोट होती है, वे अंदर से अपने प्रति भी ईमानदार नहीं होते,जो लोग ऐसे लोगों के मंदिर बनवाने में सहयोग देते हैं वे भी साहित्य के पापी कहलाने के हकदार हो सकते हैं।
व्यंंग्यकार आत्माराम भाटी(बीकानेर)__
जयप्रकाश जी ! बतौर साहित्यकार स्वयं लिखी रचना को सम्पादित करना आसान है या किसी दूसरे की रचना को सम्पादक की नजर से देखना ?
जय प्रकाश पाण्डेय__
आदरणीय जी,स्वयं लिखी रचना को सबसे पहले सम्पादित करने और कांट-छांट करने का अधिकार, कायदे से घर की होम मिनिस्ट्री के पास होना चाहिए, फिर उसके बाद आवश्यक सुधार, संशोधन आदि स्वयं लेखक को करना चाहिए, दूसरे की रचना को सम्पादक की नजर से नहीं बल्कि सुझाव की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। पहले किसी लेखक की रचना जब संपादक के पास प्रकाशनार्थ जाती थी तो संपादक लेखक की अनुमति लेकर छुट-पुट सुधार कर लेता था, आजकल तो कुछ संपादक ऐसे हैं जो विचारधारा के गुलाम हैं,सत्ता के दलाल बनकर बैठे हैं, रचना मिलते ही सबसे पहले कांट-छांट कर रचना की हत्या करते हैं बिना लेखक की अनुमति लिए। फिर छापकर अच्छी रचना बनाने का श्रेय भी खुद ले लेते हैं।
व्यंंग्यकार शशांक दुबे (मुंबई)__
पाण्डेय जी आपको व्यंग्य के बहुत बड़े हस्ताक्षर *हरिशंकर परसाई जी* का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। परसाई जी के दौर के व्यंग्यकारों के बौद्धिक व रचनात्मक स्तर में और आज के दौर के व्यंग्यकारों के स्तर में आप कोई अंतर देखते हैं?
जय प्रकाश पाण्डेय __
आदरणीय भाई दुबे जी, वास्तविकता तो ये है कि जब परसाई जी बहुत सारा लिख चुके थे, उन्होंने 1956 में वसुधा पत्रिका निकाली, उसके दो साल बाद हमारा धरती पर आना हुआ। बड़ी देर बाद परसाई जी के सम्पर्क में आए 1979 से।पर हां 1979से 1995 तक उनका आत्मीय स्नेह और आशीर्वाद मिला।
परसाई और जोशी जी के दौर के व्यंंग्यकार त्याग, तपस्या,, संघर्ष की भट्टी में तपकर व्यंग्य लिखते थे,उनका जीवन यापन व्यंग्य लेखन से होता था, उनमें सूक्ष्म दृष्टि, गहरी संवेदना, विषय पर तगड़ी पकड़ के साथ निर्भीकता थी ।आज के समय के व्यंग्यकारों में इन बातों का अभाव है। परसाई जी, जोशी जी के दिमाग राडार के गुणों से युक्त थे,वे अपने समय के आगे का ब्लु प्रिंट तैयार कर लेते थे, उन्हें पुरस्कार और सम्मान की भूख नहीं थी। बड़े बड़े पुरस्कार उनके दरवाजे चल कर आते थे।आज के अधिकांश व्यंग्यकार अवसरवादी,सम्मान के भूखे, पकौड़े छाप जैसी छबि लेकर पाठक के सामने उपस्थित हैं और इनके अंदर बर्र के छत्ते को छेड़ने का दुस्साहस कहीं से नहीं दिखता।
व्यंंग्यकार
विवेक रंजन श्रीवास्तव (जबलपुर)__
आप लंबे समय तक बैंकिंग सेवाओं मे थे,बैंक हिंदी पत्रिका छापते हैं,आयोजन भी करते हैं।
आप क्या सोचते हैं की व्यंग्य, साहित्य के विकास व संवर्धन में संस्थानों की बड़ी भूमिका हो सकती है ? होनी चाहिये ?
जय प्रकाश पाण्डेय__
विवेक भाई, हम लगातार लगभग 36साल बैंकिंग सेवा में रहे और शहर देहात, आदिवासी इलाकों के आलावा सभी स्थानों पर लोगों के सम्पर्क में रहे और अपने ओर से बेहतर सेवा देने के प्रयास किए।पर हर जगह पाया कि बेचारे दीन हीन गरीब,दलित,किसान, मजदूर,दुखी है पीड़ित हैं,उनकी बेहतरी के लिए लगातार सामाजिक सेवा बैंकिंग के मार्फत उनके सम्पर्क में रहे, गरीबी रेखा से नीचे के युवक युवतियों को रोजगार की तरफ मोड़ा, दूरदराज की ग़रीब महिलाओं को स्वसहायता समूहों के मार्फत मदद की मार्गदर्शन दिया। प्रशासनिक कार्यालय में रहते हुए गृह पत्रिकाओं के मार्फत गरीबों के उन्नयन के लिए स्टाफ को उत्साहित किया, बिलासपुर से प्रतिबिंब पत्रिका, जबलपुर से नर्मदा पत्रिका, प्रशिक्षण संस्थान से प्रयास पत्रिका आदि के संपादन किए, और जो थोड़ा बहुत किया वह आदरणीय प्रभाशंकर उपाध्याय जी के उत्तर में देख सकते हैं। बैंक में रहते हुए साहित्य सेवा और सामाजिक सेवा से समाज को बेहतर बनाने की सोच में उन्नयन हुआ, दोगले चरित्र वाले पात्रों पर लिखकर उनकी सोच सुधारने का अवसर मिला। कोरोना काल में विपरीत परिस्थितियों के चलते बैंकों में अब समय खराब चल रहा है इसलिए आप जैसा सोच रहे हैं उसके अनुसार अभी परिस्थितियां विपरीत है।
व्यंंग्यकार रमेश सैनी (जबलपुर)__
वर्तमान समय में सभी तरफ व्यंग्य पर बहुत गंभीरता से विमर्श हो रहा है,विशेषकर परसाई जी और आज लिखे जा रहे व्यंग्य के संदर्भ में। क्योंकि आज के पाठक और आलोचक इससे संतुष्ट नज़र नहीं हो रहे। एक व्यंग्य विमर्श गोष्ठी में आपके सवाल के उत्तर में यह बात उभर कर आई थी कि व्यंग्य में खतपरवार ऊग आई है,जो फसल को नष्ट कर रही है।
उक्त टिप्पणी को केंद्र में रखकर व्यंग्य में खतपरवार और अराजक परिदृश्य पर आप क्या सोचते हैं ?
इसकी सफाई कैसे संभव हैं?
जय प्रकाश पाण्डेय__
आदरणीय सैनी जी व्यंग्य विधा के उन्नयन और संवर्धन के यज्ञ में आपका योगदान महत्वपूर्ण है,अब व्यंग्य विमर्श के आयोजन के बिना आपका खाना नहीं पचता,हम सब आप से और सबसे ही बहुत कुछ सीख रहे हैं। खरपतवार हमारे अपने ही कुछ लोग पैदा कर रहे हैं इसलिए व्यंग्य की लान में ऊग आयी जंगली घास को आप जैसे पुराने व्यंग्यकारों को निंदाई का कार्य करना पड़ेगा और जो लोग खरपतवार में खाद पानी दे रहे हैं उन्हें चौगड्डे में लाकर खड़ा करना पड़ेगा। इसके बारे में विगत दिनों महत्त्वपूर्ण बातचीत को भी सुनना पड़ेगा।तो सुनिए श्री सैनी जी के सौजन्य से ये वीडियो...
http://www.zeromilepress.com/2020/10/blog-post_13.html
व्यंंग्यकार अशोक व्यास (भोपाल)__
मेरा प्रश्न है कि आजकल जो व्यंग्य पढ़ने में आ रहे हैं उसमें साहियकारों पर जिसमें अधिकतर व्यंग्यकारों पर व्यंग्य किया जा रहा है । क्या विसंगतियों को अनदेखा करके दूसरे के नाम पर अपने आप को व्यंग्य का पात्र बनाने में खुजाने जैसा मजा ले रहे हैं हम ?
जय प्रकाश पाण्डेय__
भाई साहब,सही पकड़े हैं।हम आसपास बिखरी विसंगतियों, विद्रूपताओं, अंधविश्वास को अनदेखा कर अपने आसपास के तथाकथित नकली व्यंंग्यकारों को गांव की भौजाई बनाकर खुजाने का मजा ले रहे हैं, जबकि हम सबको पता है कि इनकी मोटी खाल खुजाने से कुछ होगा नहीं,वे नाम और फोटो के लिए व्यंग्य का सहारा ले रहे हैं।
व्यंंग्यकार अलका अग्रवाल सिगतिया(मुंबई)__
आपने परसाईं जी का साक्षात्कार भी किया है।
उस साक्षात्कार के अनुभव क्या रहे?
आज यह कहा जा रहा है,व्यंग्य कार खुल कर नहीं लिख रहे,अक्सर व्यंग्य चर्चाओं में बहस छोड़ रही है ।
कितने सहमत हैं, आप?
क्या अभिव्यक्ति के खतरे पहले नहीं थे।
आपके लेखन में आप इसे कितना उठाते हैं, या स्टेट बैंक के महाप्रबंधक पद रहकर उठाए?
परसाई जी से आप अपने लेखन को लेकर चर्चा करते थे?
जय प्रकाश पाण्डेय__
अलका जी की कहानियां हम 1980 से पढ़ रहे हैं, कहानियां मासिक चयन(भोपाल) पत्रिका में हम दोनों अक्सर एक साथ छपा करते थे। उन्हें परसाई जी का आत्मीय आशीर्वाद मिलता रहा है।
वे परसाई जी के बारे में सब जानतीं हैं। पर चूंकि प्रश्र किया है इसलिए थोड़ा सा लिखने की हिम्मत बनी है।
1- सुंदर नाक नक्श, चौड़े ललाट,साफ रंग के विराट व्यक्तित्व परसाई जी से हमने इलाहाबाद की पत्रिका कथ्य रूप के लिए इंटरव्यू लिया था। हमने उनकी रचनाओं को पढ़कर महसूस किया कि उनकी लेखनी स्याही से नहीं खून से लेख लिखती थी, व्यंग्य करती थी और हृदय भेदकर रख देती थी। परसाई जी से हमारे घरेलू तालुकात थे, ऐसे विराट व्यक्तित्व से इंटरव्यू लेना बड़े साहस का काम था। इंटरव्यू के पहले परसाई जी कुछ इस तरह प्रगट हुए जैसे अर्जुन के सामने कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया था। उनके विराट रूप और आभामंडल को देखकर हमारी चड्डी गीली हो गई, पसीना पसीना हो गये क्योंकि उनके सामने बैठकर उनसे आंख मिलाकर सवाल पूछने की हिम्मत नहीं हुई,तो टेपरिकॉर्डर छोटा था हमने बहाना बनाया कि टेपरिकॉर्डर पुराना है आवाज ठीक से रिकार्ड नहीं हो रही और हम उनके सिर के तरफ बैठकर सवाल पूछे। परसाई जी पलंग पर अधलेटे जिस ऊर्जा से बोल रहे थे,हम दंग रह गए थे।
2- हमारा सौभाग्य था कि हमारी पहली व्यंग्य रचना परसाई ने पढ़ी और पढ़कर शाबाशी दी, और लगातार लिखते रहने की प्रेरणा दी।
3- आजकल बहुत से व्यंंग्यकार खुल कर नहीं लिख रहे हैं, इस बारे में आदरणीय शशांक दुबे के उत्तर में स्पष्ट कर दिया गया है।
आपका आभार।
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From: jai prakash Pandey
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Tuesday, June 6, 2023
व्यंग्य
व्यंग्य___
"ब से बजट और
बसंत"
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बजट के बाद 'बसंत' इधर से उधर भागमभाग मचाए हुए है
पीली सरसों के खेतों से लेकर अमराई तक दौड़ रहा है जब पूछा - कि क्यों दौड़ रहा है ? तो कहता है - लोकतंत्र के खातिर दौड़ चल रही है। लुढ़को बाई चिंतित है कि सड़कों पर नुकीली कीलों की फसल लगी है , और ये बसंत है कि लगातार दौड़ रहा है, इस बार के बजट में स्टील सेक्टर पर जोर इसीलिए दिया गया था कि बजट के बाद सड़कों पर स्टील की नुकीली कीलें लगाने के काम से स्टील उद्योग में उछाल आयेगा।
लुढ़कोबाई परेशान है कि बेचारा बसंत भूखा प्यासा दौड़ रहा है।लुढ़कोबाई की चिंता जायज है, उसे लगता है कहीं नुकीली चीजों से बेटा घायल न हो जाए , इसीलिए ज्यादा चिंता कर रही है। लुढ़कोबाई के पास दो बीघा जमीन है इसलिए बसंत भी अपने आपको किसान कहलाने पर गर्व करता है, पर उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि किसान के भाग्य में बजट के बाद ये नुकीली कीलें ठोंकी जाएंगी।
लुढ़कोबाई की छोटी सी किराना दुकान भी है उसी के सहारे भूख मिटाने का जुगाड़ बनता है। लुढ़कोबाई के दो बेटे हैं एक का नाम 'बसंत 'है और दूसरा है' विकास '.........
बजट में विकास ही विकास का बड़बोलापन है इसलिए लोग कहते हैं कि विकास पागल हो गया है लोग वोट को विकास से जोड़ देते हैं,पर ये बसंत को क्या हो गया है कि लोकतंत्र की चिंता में खाना पानी छोड़ के सरसों के खेतों से लेकर जंगल के महुआ के पेड़ों तक इधर से उधर भाग रहा है। पेट के लिए सूखी रोटी और सोने के लिए थिगड़े वाली कथरी ही लुढ़कोबाई का लोकतंत्र है पर ये बसंत है कि उसे लोकतंत्र पसंद है जबकि 'विकास ' वोट के चक्कर में घूमता है। विकास और बजट नाम ही ऐसे हैं जिसमें कुछ खास तरह का आकर्षण होता है।खपरेवाली किराना दुकान से नून - तेल लेने आने वाला गंगू अक्सर बेचारे बसंत को पूछता रहता है वो भी लोकतंत्र और बसंत के लिए चिंतित रहता है।
लुढ़कोबाई की दुकान में जीएसटी वाले साहेब आये हैं कह रहे हैं कि "लोकतंत्र में बसंत" लाने के लिए जीएसटी अनिवार्य है। लुढ़कोबाई परेशान है साहब से पूछ रही है - साहब जे "लोकतंत्र" क्या बला है ?...
साहब की आंखें नम हैं नम आंखों में नमक मिला जीएसटी का पानी है आंखों का नमक मिला पानी जब बह के मुंह में घुसने लगा तो साहब का मुंह खुल गया - सुनो लुढ़कोबाई ये लोकतंत्र मंहगी और समय बर्बाद करने वाली खूबी का नाम है भ्रमित करने का एक तरीका है, चुनावी भाषण में यह कहने की चीज है कि लोकतंत्र में लुढ़कोबाई सत्ता की मालकिन है।
लोकतंत्र में बसंत लाने के लिए लुढ़कोबाई एक अदने से बूथ तक चलके और एक अदने सी ईवीएम मशीन की बटन दबाके' सेवक 'पैदा करती है और सेवक अचानक सत्ता का शासक बन जाता है फिर उसके लोकतंत्र और बजट में बसंत आ जाता है। यही लोकतंत्र है।
लुढ़कोबाई डरते हुए हुए कह रही है - साहब हमारे बसंत को समझा दो वो बेचारा सरसों के खेतों और जंगल के महुआ में लोकतंत्र को ढूंढ़ रहा है भूखा प्यासा दौड़ता रहता है।
---सुनो लुढ़कोबाई ! इस बार के बजट में सबका बसंत लुढ़क गया है, सब लोग चिंता में है कि पिछले साल की सारी संपत्ति अमीरों के पास कैसे चली गई, कोरोना आया तो अमीरों की संपत्ति बेहिसाब बढ़ी, और बाबा ने कह दिया आपदा में अवसर का कमाल है।भयानक आर्थिक असमानता से लोकतंत्र भी परेशान हो गया है और भ्रष्टाचार और 'विकास" का दबदबा बढ़ गया है।
बसंती बयार चल रही है और विकास कंटीले तार की बाड़ और नुकीली कीलें देखकर खुश हो रहा है, गांव भर के लोग विकास को चिढ़ा रहें हैं ये चिढ़ चिढ़कर और पगला रहा है । लुढ़को बाई लोगों से बार बार पूंछ रही है कि हमारे लुढ़के विकास को ठीक करने का कछु उपाय हो तो बताओ ?
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जय प्रकाश पाण्डेय
व्यंग्य - कौन बनेगा महापुरुष
व्यंग्य ___
"कौन बनेगा महापुरुष!"
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_ ना.. साहब, सुने हैं कि जे नये कलेक्टर साब ज्यादई तेज तर्रार हैं, सब अफसरों को परेशान कर रिये हैं - - गंगू पूछ रहा है।
मालिश करते हुए बीच बीच में गंगू ऐसे कई सवाल पूछ लेता है... वो भी ऐसे ऐन वक्त पर जब वो गर्दन चटकाने की तैयारी में गर्दन पकड़ कर खड़ा होता है।
गंगू हमको साहब इसीलिए कहता रहता है क्योंकि हम स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर हैं एवं जिले के कलेक्टर से लेकर सभी विभागों के अफसरों के साथ उठते बैठते हैं। ये आदिवासी पिछड़ा जिला है अफसरों के लिए पनिसमेन्ट सेन्टर कहलाता है। यहां हर विभाग के अफसर को भ्रष्टाचारी, दारूखोर और चरित्रहीन होना जरूरी है क्योंकि पिछड़ेपन के कारण मनोरंजन के भी कोई साधन नहीं हैं, सब अफसर बंगलों में अकेले रहते हैं और फेमिली शहर में रखते हैं। इस जिले में सब टाइम पास करने आते हैं।
जब से नया कलेक्टर आया है लोग उसे झक्की कलेक्टर कहते हैं क्योंकि वो जिले का विकास चाहता है, अफसरों को सुधारना चाहता है, अफसरों के अंदर गांधी दर्शन भरना चाहता है। कई दिनों से मुझे भी परेशान किए है, कहता है कि - 150 साल के अवसर पर अपने प्रशिक्षण संस्थान में अफसरों के लिए गांधी दर्शन के प्रशिक्षण आयोजित करें। कलेक्टर चाहता है कि अफसर गांधीवादी बन जायें तो विकास सही ढंग से होगा।
राजनीति सब जगह हावी रहती है, शहर के छुटभैया नेता प्रशिक्षण संस्थान का नाम बदलकर दीन दयाल संस्थान करना चाहते हैं और कलेक्टर है कि संस्थान में गांधी दर्शन के प्रशिक्षण करवाना चाहता है। अफसर नहीं चाहते कि वे कलेक्टर के हिसाब से गांधीवादी बने। अफसर अपने हिसाब से कभी गांधीवादी तो कभी संघी बनना चाहते हैं।
अफसरों का गांधीवादी चिंतन अलग होता है। एक आला अफसर पूछ रहा था कि गांधी जी महापुरुष थे कि महात्मा थे ? दूसरा अफसर कहता है गांधी महात्मा कहलाते थे इसलिए उनको महात्मा गांधी कहा जाता है। जब उनसे पूछा गया कि वे महात्मा गांधी क्यों कहलाते हैं तो उनका सीधा जबाब था कि भारत के महापुरुष रवींद्र नाथ टैगोर के मुंह से एक बार गांधी के लिए 'महात्मा' शब्द निकल गया था तो वे महात्मा गांधी कहलाने लगे, तो जय बोलो महात्मा गांधी की....... । महापुरुषों की बात ही अलग होती है।
दो अफसरों के बीच नशे में महात्मा और महापुरुष शब्दों के चक्कर में लड़ाई हो गयी..... एक कहता कि महात्मा और महापुरुष में कोई अन्तर नहीं है, महात्मा गांधी महापुरुष थे। दूसरे का मत था कि जिसके पास महान आत्मा होती है वे महात्मा होते हैं और जो सब पुरुषों में बड़े होते हैं वे महापुरुष कहलाते हैं। पहले वाले ने तर्क दिया ऐसे में तो स्त्री...., महापुरुष बन ही नहीं सकती, एक महिला अफसर सब सुन रही थी बोली - बड़ी अजीब बात है, महापुरुषों में सिर्फ पुरुषों का अधिकार है इसलिए महिला ने बताया कि उसने अपने बेटे का नाम 'महापुरुष' रखा है , धोखे से उसकी सिंह राशि निकल आयी, ज्योतिषी कहता है कि महापुरुष नाम के लड़के की राशि का स्वामी सूर्य होता है सूर्य तेज होता है इसलिए हमारा महापुरुष किसी के सामने झुकता नहीं। महापुरुष नाम के लड़के में सभ्यता और ईमानदारी कूट कूट कर भरी होती है इसलिए ये आगे चलकर महापुरुष बन सकता है। मेडम की बात सुनकर चिड़चिड़े स्वाभाव के तीसरे अफसर को मुंह खोलने का अच्छा मौका मिल गया, कहने लगा - इसका मतलब हमारे नये कलेक्टर की भी सिंह राशि है और उनका ग्रह स्वामी सूर्य होगा तभी वे तेज तर्रार हैं और महापुरुष बनने के जुगाड़ में हैं।
गांधी जी सत्य के पुजारी थे, अफसर को भी सत्य बोलना पड़ता है क्योंकि उसे अपने कमीशन रेट के बारे में सच सच बतलाना पड़ता है, ठेकेदार भी अफसर के सत्य से प्रभावित रहता है और सच्चाई के साथ निर्धारित कमीशन गांधी की तस्वीर के सामने इमानदारी से अदा कर देता है। सारे कार्य नियम से होते हैं। गांधीजी भी नियम के पाबंद थे, अफसर भी पाबंद हैं। नया कलेक्टर गांधीवाद को अफसरों के ऊपर लादना चाहता है। कलेक्टर उन्हें गांधीवादी बनने पर जोर दे रहा है। जिस ढंग से कलेक्टर चाहता है उस ढंग से अफसर वैसा नहीं बनना चाहते। अफसर गांधीवादी क्यों बनेंगे...... अफसर और गांधीवाद दो विरोधी चीजें हैं। अफसर अफसर होता है और महापुरुष बेचारा महापुरुष ही तो होता है।
यदि गांधी जी महापुरुष थे और गांव का विकास चाहते थे तो अफसर भी तो गांव के विकास के बहाने अपना विकास चाहते हैं। अफसरों का भाग्य इतना तेज दौड़ता है कि इधर सड़क बननी चालू हुई उधर बुलडोजर से उचकी गिट्टी साहब के बंगले में तब्दील हो जाती है। अभी तक अफसरों का जितना विकास हुआ है उसमें गांव की सड़क, बांध और ग्रामीण विकास योजनाओं ने अफसरों की खूब मदद की है।
कलेक्टर को महापुरुष बनने का शौक है तो वे क्यों नहीं गांधी दर्शन के प्रशिक्षण लेते, हम सबको प्रशिक्षण में काहे फंसा रहे हैं।
मैंने कहा - इसमें फंसने की क्या बात है कलेक्टर का सोचना सही है कि सब अफसर गांधी दर्शन को समझकर देश की समस्याएं हल कर सकते हैं।
मेरी बात से कई अफसर भड़क गए कहने लगे - देश की समस्याओं को हल करने का ठेका हमीं लोगों ने लिया है क्या? देश का और जनता का सबसे ज्यादा शोषण नेता कर रहे हैं। देश के नेता तो असली गांधीवादी बन नहीं सके और कलेक्टर चाहते हैं कि अफसर गांधीवादी बनें।
मुझे उनके तर्क कुछ ठीक लगे। नेता अगर गांधीवादी होते तो देश की यह हालत न होती। गांधीवाद का नाम लेकर देश को इस हाल में पहुंचा दिया कि चौराहे में गांधी के पोस्टर में गोली मारके लोग खुश हो रहे हैं। गांधीवाद की सबकी परिभाषाएं अलग अलग हैं, हर पार्टी ऐन वक्त में गांधीवादी बन जाती है 150 वें साल में गांधी पर इतने प्रयोग हो रहे हैं ऐसे में राजनीतिक पार्टियों के लिए गांधीवाद रबर के समान है चाहे जब खींचकर महापुरुष बना दिया और चाहे जब छोड़कर गढ्ढे में गिरा दिया।
गांधी महापुरुष थे इसलिए गांधी के नाम पर सारी पार्टियां चुनाव लड़तीं हैं, गांधी की समाधि पर कसम खातीं हैं। चुनाव जीतने के बाद गांधी को भूल जातीं हैं।
नये जमाने के अनुसार आजकल वही नेता महापुरुष बन पायेंगे जो सच को झूठ की तरह बोलते हैं और दाढ़ी रखकर गंभीर होने का नाटक करते हैं या जिनके पास चमकती चांद होती है और रंगदारी करते हैं।
सत्ता गांधीवाद की विरोधी होती है गांधीवाद को भूलकर ही सत्ता को बचाया जा सकता है।
सत्ता और गांधी एक साथ नहीं चल सकते। सब अफसर यदि महापुरुष बनने के चक्कर में गांधीवादी बन गए तो सरकार कौन चलाएगा। सरकार को अफसरों से मिलकर चलाया जाता है। अफसर यदि नाराज हो गए तो सरकार चलना कठिन है इसलिए गांधीवाद का दिखावा दोनों को करना पड़ता है। कब कौन प्रधानमंत्री महापुरुष बन जाए, कोई ठिकाना नहीं है। तभी तो गंगू कौन बनेगा करोड़पति स्टाइल में अभिताभ की नकली आवाज में पूछ रहा है कौन बनेगा महापुरुष ?
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जय प्रकाश पाण्डेय
416 जय नगर जबलपुर
9977318765
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