Thursday, June 29, 2023
पिता
कविता ,
" पिता "
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पिता बैठते हैं कभी
इधर और कभी उधर,
कभी अमरूद के नीचे
कभी परछी के किनारे
कभी खोलते हैं कुण्डी
फिर बंद करते हैं किवाड़
गाय को डालते चारा
बछिया को दूध पिलाते
लौकी की बेल पकड़ लेते
फिर खीरा तोड़ ले आते
अम्मा पर चिल्लाने लगते
आंगन के कचरे से चिढ़ते
चिड़ियों को दाना डाल देते
कभी चिड़चिड़े हो रोने लगते
बरसते पानी में भीगने लगते
पिता हर जगह मौजूद रहते खांसते और छींकते हुए
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जय प्रकाश पांडेय
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