Sunday, June 11, 2023
परसाई से साक्षात्कार
ख्यातिलब्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई से व्यंग्यकार जय प्रकाश पाण्डेय की बातचीत के अंश--
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1993 में जय प्रकाश पाण्डेय ने परसाई जी का साक्षात्कार लिया था।यह साक्षात्कार उनके जीवन का अन्तिम साक्षात्कार माना जाता है ।
परसाई जी से सवाल--
जय प्रकाश पाण्डेय--
विश्व के प्राय: सभी महान लेखक कथा का सहारा लेते रहें हैं,स्केलेटन के रूप में क्यों न सही ।आप एक ऐसे लेखक हैं जो अपनी उत्तरोत्तर बढ़ती लोकप्रियता के समान्तर सदियों से आजमाये इस हथियार को लगातार छोड़ते चले गए। आपने अपना साहित्यिक कैरियर कथाकार के रूप में शुरू किया, किन्तु कालान्तर में आप कथा की दुनिया छोड़ निबंधों की ओर मुड़ गये, अपने इस जोखिम भरे विकास क्रम पर आप क्या टिप्पणी करना चाहेंगे ?
हरिशंकर परसाई--
हां, कथा बहुत रोचक होती है और उसके पाठक सबसे अधिक होते हैं। ये भी सही है कि महान साहित्य या तो महाकाव्य में लिखा गया है या उपन्यासों में या कहानियों में। आरंभ में मैंने भी कहानियां लिखीं, उससे मुझे लोकप्रियता भी प्राप्त हुई, कहानियां मैं लगातार लिखता रहा, अभी अभी भी मैं अक्सर कहानी लिख लेता हूं, मेरी करीब 350 कहानियां हैं, परन्तु मुझे इसकी चिंता नहीं कि किस विधा में लिख रहा हूं या मैं उस विधा के नियम मान रहा हूं या नहीं मान रहा हूं। कुछ लोग कहते भी थे कि ये लिखते हैं कहानियां, लेकिन ये कहानी की परिभाषा में नहीं आता.....तो मैं उनसे कहता था कि आप कहानी की परिभाषा बदल दीजिए,इस प्रकार मैंने इन विधाओं के स्ट्रक्चर को उनकी बनावट को भी तोड़ा और परम्परा से जो रीति चली आ रही थी उसको भी मैंने एक नये प्रकार से तोड़ा।
मेरे सामने जो समस्या थी वह कहानी या उपन्यास लिखने की समस्या नहीं थी, और न अभी है। मेरे सामने जो समस्या शुरू से रही है वह यह कि इस पूरे समाज का सर्वेक्षण करके,जीवन को समझकर,जीवन की समीक्षा जो मैं कर रहा हूं, इस समीक्षा के लिए कौन सा माध्यम सबसे उपयोगी होगा तो मुझे लगा निबंध एक बहुत अच्छा माध्यम है इसके लिए। क्योंकि निबंध में स्वतंत्रता होती है। मेरे निबंध न ललित निबंध हैं, जैसा कि आमतौर पर लिखे जाते हैं,वे ठोस विषयों पर लिखे हुए होते हैं, और ठोस परिणति तक पहुंचते हैं। जैसा कि क्रून्सी ने कहा है - "आइडियल शैली आफ माइन्ड" वे भी नहीं हैं वो ।इन निबंधों में मैंने जिस विषय को उठाया है, उसके बहाने मैंने आसपास बिखरे दसों पच्चीसों विषयों पर तिरछे प्रहार किए हैं....तो निबंधों में स्वतंत्रता बहुत होती है।ये नहीं कि कथा यहां अटक गई है उसे अटकना नहीं चाहिए, उसे चलना ही चाहिए। मैं निबंध में एक स्थान पर रुककर किसी दूसरे विषय पर भी व्यंग्य कर देता हूं, तो ये सुभीता व्यंग्य में है। मेरे व्यंग्य भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितनी कहानियां.... इसीलिए मैंने व्यंग्य को अपनाया।उसी प्रकार उपन्यास को ले लीजिए ,लघु उपन्यास भी मैंने लिखे।एक तो "तट की खोज" यह देवकथा है । ये लंबी कहानी है,इस लघु उपन्यास में व्यंग्य नहीं है।यह वास्तव में अत्यंत करुण कहानी है, एक लड़की की करुण कहानी है। लेकिन दूसरा जो मैंने लघु उपन्यास लिखा "रानी नागफनी की कहानी" वह पूरा का पूरा व्यंग्य है।उस व्यंग्य में मैंने एक वर्ग को लिया है।एक मामूली सा प्रेम प्रसंग के बाद मैंने देश की समस्याएं और विश्व की समस्याएं, ये सब की सब उसमें मैं व्यंग्य के द्वारा ले आया हूं, और पुस्तक मात्र 130-140 पेज की है, उसमें पूरे विश्व की समस्याएं ले ली गईं हैं। इसमें पूरा-पूरा व्यंग्य है। तो इस प्रकार के उपन्यास मैं लिख सकता हूं, लेकिन परंपरागत उपन्यास जो हैं उनको लिखना मेरे वश की बात नहीं है। मैं फेन्टेसी लम्बी लिख सकता हूं, हां फेन्टेसी उपन्यास... जैसा कि स्पेनिश लेखक सर्वेन्टीस का है "डान की होट" जिसमें एक सामंत है,वह पगला है और उसका एक पिछलग्गू है और वह भी पगला गया है। और उनके द्वारा लेखक ने यूरोप के सामंतवाद का उपहास किया है। ऐसी लम्बी फेन्टेसी या ऐसा लंबा फेन्टेसी उपन्यास मैं लिखना चाहता था, इसके छह चेप्टर मैंने एक पत्रिका में सीरियलाइज किेए, लेकिन छह केबाद वह पत्रिका ही बंद हो गई (हंसते हुए..)अब छैह के छैह वैसे ही रखे हुए हैं, मैं उसको पूरा नहीं कर पा रहा हूं, इस प्रकार मैं उपन्यास लिखना चाहता था पर नहीं लिख सका।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपका व्यक्तिगत जीवन प्रारंभ से ही नाना प्रकार के हादसों और ट्रेजिक स्थितियों से घिरा होने के कारण बहुत संघर्षपूर्ण ,अनिश्चित व असुरक्षित रहा है,इस प्रकार का जीवन जीने वाले व्यक्ति के लेखन का स्वाभाविक मार्ग, सामान्य तौर पर दास्तोएव्सकी और मुक्तिबोध का मार्ग होना चाहिए, जबकि व्यक्तिगत जीवन के ठीक विपरीत आपके लेखन में अगाध आत्मविश्वास यहां तक कि विकट विजेता भाव के दर्शन होते हैं। दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध की तरह आप जीवन के डेविल फोर्सेस का आतंक नहीं रचते,वरन् इनका विद्रूपीकरण करते हैं,इनका मजाक उड़ाते हैं, इन्हें हास्यास्पद बनाते हुए इनकी दुष्टता व क्षुद्रता पर प्रहार करते हैं। कहने का आशय यह है कि अंतहीन आतंककारी स्थितियों, परिस्थितियों के बीच लगातार बने रहते हुए आपने जिस तरह का लेखन किया है उसमें उस असुरक्षा भाव की अनुपस्थिति है जो दोस्तोवस्की वह मुक्तिबोध के लेखन की केन्द्रीय विशेषताओं में से एक है,इस दिलचस्प "कान्ट्रास्ट"पर क्या आपने स्वयं भी कभी विचार किया है ?
हरिशंकर परसाई---
देखिए..एक तो ये है कि दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध में भेद करना चाहिए।यह सही है कि दोस्तोवस्की ने रूसी समाज एवं रूसी मनुष्य के दिमाग के अंधेरे से अंधेरे कोने को खोजा है और उस अंधेरेपन को उन्होंने चित्रित किया है तथा बहुत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। क्रूरता, गरीबी, असहायता,कपट और छल आदि जो रूसी समाज की बुराईयां हैं वे सब की सब दोस्तोवस्की के लेखन में हैं। टालस्टाय ने इन्हें ईवीजीनियस कहा है।अब उनके पास इन सब स्थितियों को स्वीकारने के सिवाय,उन पर दुखी होने के सिवाय और लोगों का कुछ भला करने की इच्छा के सिवाय कोई और उनके पास आशा नहीं है और न उनके पास मार्ग है। एक तो वे स्वयं बीमार थे,मिर्गी के दौरे उनको आते थे,जुआ खेलने का भी शौक था, उनके बड़े भाई को फांसी हो गई थी, जारशाही ने फांसी दे दी थी।वे खुद दास्वासेलिया में रहे थे,कष्ट उन्होंने बहुत सहे लेकिन उनके सामने कोई रास्ता नहीं था। जैसे उनके उपन्यास 'इडियट' मेंं जो प्रिंस मुस्की है वो सबके प्रति दयालु है और सबकी सहायता करना चाहता है,सबका भला करना चाहता है,जो भी दुखी है पर किसी का भला नहीं कर सकता,उस सोसायटी में भला नहीं कर सका। विश्वास उनके क्या थे ? वास्तव में उनके पास पीड़ा थी, दर्द था,वे अपने समाज की सारी बुराईयों को,अनीतियों को समझते थे, लेकिन विश्वास नहीं था उनके पास। और दूसरा यह कि कर्म नहीं था, और संघर्ष नहीं था। उनके पात्र स्थितियों को स्वीकार कर लेते हैं,कर्म और संघर्ष नहीं करते। एकमात्र उनका संबल जो था वह कैथोलिक विश्वास था, तो मोमबत्ती जलाकर ईश्वर की प्रार्थना कर ली, ये नियतिवाद हुआ,भाग्यवाद हुआ, संघर्ष कदापि नहीं हुआ।
मुक्तिबोध की चेतना में अपने युग में सभ्यता का जो संकट था उसकी समझ बहुत गहरी थी, एक पूरी मनुष्य जाति की सभ्यता के संकट को वे समझते थे। उससे दुखी भी वे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अंधेरे का चित्रण किया है, ये सही है उन्होंने विकट परिस्थितियों का चित्रण किया है, उन्होंने टूटे हुए लोगों का चित्रण किया है, और पीड़ित लोगों एवं पीडिकों का भी चित्रण किया है, लेकिन इसके साथ साथ मुक्तिबोध में आशा है और वे विश्वास करते हैं कि कर्म से, संघर्ष से ये हालात बदलेंगे।इस विश्वास का कारण क्या है ? इस विश्वास का कारण है उनका एक ऐसे दर्शन में विश्वास, जो कि मनुष्य के जीवन को सुधारने के लिए संघर्ष का रास्ता दिखाता है।
दोस्तोवस्की के पास ऐसा दर्शन नहीं था। कैथोलिक फेथ में तो भाग्यवाद होता है,कर्म नहीं होता, इसीलिए उन्होंने जगह जगह जहां बहुत गहरा अंधेरा चित्रित किया है, मुक्तिबोध ने कहीं न कहीं एक आशा की किरण प्रगट कर दी है।
इस तरह उनके काव्य में संघर्ष, आशा और समाज पलटेगा, स्थितियां बदलेंगी ये विश्वास मुक्तिबोध के अन्दर है,इस कारण दोस्तोवस्की और मुक्तिबोध में फर्क है क्योंकि दोस्तोवस्की ने पतनशीलता स्वीकार कर ली है और मुक्तिबोध ने उस अंधेरे को स्वीकार नहीं किया है, ये माना है कि ये कुछ समय का है और इतिहास का एक फेस है यह, तथा संघर्षशील शक्तियां लगी हुई हैं जो कि इसको संघर्ष करके पलट देंगी,बदल देंगी,ऐसी आशा मुक्तिबोध के अन्दर है। जहां तक मेरा सवाल है मैंने दोस्तोवस्की को भी बहुत ध्यान से लगभग सभी पढ़ा है, मुक्तिबोध को भी पढ़ा है। मेरे विश्वास भी लगभग मुक्तिबोध सरीखे ही हैं, इसमें कोई शक नहीं है, इसीलिए निराशा या कर्महीनता मेरे दिमाग में नहीं है, मैंने एक तो क्या किया कि अपने को अपने दुखों से, अपने संघर्षों से, अपनी सुरक्षा से, अपने भय से, लिखते समय अपने आपको मुक्त कर लिया और फिर मैंने यह तय किया कि ये सब स्थितियां जो हैं,इनका विद्रूप करना चाहिए,इनका उपहास उड़ाना चाहिए, उनसे दब नहीं जाना चाहिए, तो मैं उनसे दबा नहीं। मैंने व्यंग्य से उनके बखिया उधेड़े,उनका मखौल उड़ाया, चोट की उन पर गहरी। इसमें मेरा उद्देश्य यह था कि समाज अपने को समझ ले कि हमारे भीतर ये ये कुछ हो रहा है। इसमें मेरा उद्देश्य ये रहा है कि समाज आत्म साक्षात्कार करे, अपनी ही तस्वीर देखे और उन शक्तियों को देखे,उन काली शक्तियों को समझे जिन काली शक्तियों को मैंने विद्रूप किया है,उन पर व्यंग्य किया है और जिन पर सामयिक मखौल उड़ाया है,उन स्थितियों के साथ मेरा ट्रीटमेंट जो है वह इस प्रकार का है जो कि मुक्तिबोध और दोस्तोवस्की इन दोनों से अलग किस्म का...।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपना साहित्यिक कैरियर कथाकार के रूप में शुरू किया, प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले एक समर्थ कथाकार के रूप में समादृत भी हुए, फिर कालान्तर में आप कथा की दुनिया छोड़ निबंधों की दुनिया में चले गए, अपने इस जोखिम भरे विकास क्रम पर आप क्या कहना चाहेंगे ?
हरिशंकर परसाई--
इसमें कोई जोखिम नहीं था, मेरे निबंध भी उतने ही लोकप्रिय हुए और मेरी कहानियां भी खूब लोकप्रिय हुईं। मुझे अभिव्यक्ति के लिए और स्वतंत्रता चाहिए थी और वह माध्यम मुझे निबंध लगा,यही मुझे अनुकूल लगा और मैंने उसे ग्रहण कर लिया।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपके बहुत सारे पाठकों-प्रशंसकों से की प्रबल इच्छा रही है कि छोटे-आकार-प्रकार वाले लेखों-टिप्पणियों में जिनमें स्तम्भ लेखन भी शामिल है, से मुक्त होकर अब आपको कोई बड़ा उपन्यास या नाटक या ऐसी ही कोई और चीज लिखनी चाहिए, कोई ऐसी रचना जिसमें समकालीन जीवन अपेक्षाकृत अधिक विविधता और सम्पूर्णता के साथ एक जगह चित्रित हो सके, इस इच्छा में क्या आप स्वंय को भी शामिल मानते हैं ?
हरिशंकर परसाई--
हां, मुझसे अपेक्षा तो बहुत पहले से की जा रही है, मैं उस तरह का उपन्यास,जिसको परंपरागत उपन्यास कहते हैं,उसको तो नहीं लिख सकता। मुझमें वह टेलेंट नहीं है और जैसा कि मैंने आपसे कहा कि मैं एक फेन्टेसी उपन्यास लिख सकता हूं, जिसमें सभी क्षेत्र आ जावें जीवन के, और कोशिश भी कर रहा था उसके लिए.....अब इस अवस्था में जबकि मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता, क्षीणता भी आ गई है, मैं उतनी मेहनत भी नहीं कर पाता....उम्र भी 71 साल के लगभग हो रही है, मैं कोई उपन्यास बड़ा लिख सकूंगा उसकी मुझे अभी संभावना तो नहीं दिखती है।हो सकता है कि कुछ परिस्थितियां पलटें और मैं लिखूं। लिखना जरूर चाहता हूं, लेकिन फिर या तो किसी व्यक्ति को लेकर, उसके जीवन पर आधारित उपन्यास, जिसमें और भी बहुत से पात्र आ जावेंगे, उसमें समाज का चित्रण हो सकेगा या फिर वौ एक लम्बी फेन्टेसी होगी उपन्यास के रूप में। मैं आशा करता हूं कि जैसी अपेक्षा है मुझसे,इस तरह का एक बड़ा उपन्यास लिखूं......
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपके गद्य लेखन को व्यंगमूलक मानने के बावजूद इधर कुछ महत्वपूर्ण आलोचकों ने उसमें भाव के प्रामाश्य को रेखांकित किया है। व्यंग्य मूलतः एक आक्रामक या संहारक रचना शैली है, इसमें करुणा जैसे विरोधी भाव का अंतरयोग सिद्धांतत: बहुत कठिन है। व्यंग्य की रचना शैली के विशिष्ट अनुशासन के भीतर आप करुणा भाव को कैसे चरितार्थ कर पाते हैं ?
हरिशंकर परसाई---
ऐसी स्थितियां होतीं है जो करुण स्थितियां होती हैं, मेरी रचनाओं में आयी हैं। जैसे कि "अन्न की मौत" मेरा एक निबंध है, उसमें जब बहुत कठिनाई है आटा मिलने में, तो कहीं से मुझे आधा बोरा आटा मिल जाता है,जब उसे खोलते हैं तो उसमें मरा हुआ चूहा निकलता है,तो हम भाई-बहन चारों उस बोरे के आसपास बैठ जाते हैं और हमें याद आता है कि जब हमारे चाचा मरे थे तब भी हम इसी तरह बैठे थे, तो ये "अन्न"मरा है।तब भी हम इसी तरह बैठे हैं।अब ये स्थिति तो बहुत करुण है...न...। ये बहुत करुण स्थिति है, लेकिन मैंने पूरे के पूरे निबंध को जिस स्थिति में लिखा उसमें व्यंग्य ही व्यंग्य आता है।उस बोरे के आसपास उदास बैठना, इसमें कुछ विनोद ही ज्यादा है, फिर मैंने लिखा है कि "यहां तो अमेरिका से आयेगा गेहूं, तब मिलेगा" ।
फिर एक वाक्य है- "इस देश के बच्चे बच्चे को पानी के जहाजों के आने का टाइम टेबल मालुम हो जाता है"। इस तरह के वाक्य हैं उसमें।
तो बहुत करुण परिस्थिति के बीच ये व्यंग्य निकल आता है इस तरह का। यह व्यंग्य जो होता है वह उन परिस्थितियों के ऊपर होता है जिसके कारण वो करुणा पैदा हुई है कोई परिस्थितियां हैं ऐसी जिसके कारण वह करुणा पैदा हुई है।
तो मैं ये मानता हूं कि व्यंग्य में करुणा ही अन्तर्धारा होती है, यद्यपि मैं व्यंग्य विनोद लिखता हूं, ये बात सही है पर वास्तव में मैं बहुत दुखी आदमी हूं, दुःखी होकर लिखता हूं.... मैं इसीलिए दुःखी हूं कि देखो मेरे समाज का क्या हाल हो रहा है, मेरे लोगों का क्या हाल है, मनुष्य का क्या हाल होता जा रहा है, ये सब दुख मेरे भीतर हैं, करुणा मेरे भीतर है.... मैं बहुत संवेदनशील आदमी हूं,इस कारण से करुणा की अंतर्धारा मेरे व्यंग्य के भीतर रहती है।इस प्रकार जैसे में विकट ट्रेजडी को व्यंग्य और विनोद के द्वारा उड़ा देता हूं,उसी प्रकार उस करुणा के कारणों को भी मैं व्यंग्य की चोट से मारता हूं या उन पर विनोद करता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय---
यह माना जाता है कि सामाजिक-राजनैतिक रूप से जागरूक और मानसिक-वैचारिक रूप से परिपक्व भाषा-समाज में ही श्रेष्ठ व्यंग्य लेखन संभव है। बंगला व मलयालम में इसकेे बाबजूद व्यंग्य लेखन की कोई समृद्ध परंपरा नहीं है, जबकि अपेक्षाकृत अशिक्षित व पिछड़े हिन्दी भाषा समाज में इसकी एक स्वस्थ व जनधर्मी परम्परा कबीर के समय से ही दिखाई पड़ती है। आपकी दृष्टि में इसकेे क्या कारण है ?
हरिशंकर परसाई__
हां, आपका यह कहना ठीक है कि बंगला और मलयालम में व्यंग्य की एक समृद्ध परंपरा नहीं है, और न व्यंग्य है, जहां तक मैं जानता हूं। पर यह कहना कि एक बड़ी परिष्कृत भाषा में ही व्यंग्य बहुत अच्छा होता है या होना चाहिए, इस बात से मैं सहमत नहीं हूं। देखिए लोकभाषा में बहुत अच्छा व्यंग्य विनोद होता है। आपने बुंदेलखंडी के व्यंग्य विनोद अवश्य सुनें होंगे। आपस में लोग बातचीत करते करते व्यंग्य विनोद करते हैं, कितने प्रभावशाली होते हैं, अब वह तो लोकभाषा है, आधुनिक भाषा रही नहीं, आधुनिक भाषा तो खड़ी बोली हिन्दी है।
लोकभाषा में बहुत अच्छा व्यंग्य, बहुत अच्छा विनोद होता है, तो मैं समझता हूं कि भाषा किसी भी प्रकार से इसमें बाधक नहीं है। आवश्यकता है व्यंग्य चेतना की।
किसी भाषा के लेखकों में व्यंग्य चेतना अधिक होगी तो वे व्यंग्य अधिक लिखेंगे। लोकभाषा बुंदेली में या भोजपुरी में लोग बात बात पर व्यंग्य करते हैं, बात बात में विनोद करते हैं, तो उन लोगो की कहने की शैली भी व्यंग्यात्मक हो गई है। यद्यपि लोकभाषा में व्यंग्य अधिक लिखा नहीं गया है पर वे व्यंग्य करते हैं, विनोद करते हैं। हिंदी वैसे नयी भाषा है, बहुत समृद्ध नहीं, पर इसमें कबीरदास की भाषा से तो हिंदी शायद न भी कहीं चूंकि वह बहुत प्रकार के मेल से बनी भाषा है। उन्होंने भाषा को तोड़फोड़ कर ठीक-ठाक कर लिया है, विद्रोही थे वे। कबीर दास में व्यंग्य है। आधुनिक भाषा हिन्दी में व्यंग्य की परंपरा है, भारतेन्दु हरिश्चंद्र के अलावा 'मतवाला' जो पत्र निकलता था उसमें उग्र, मतवाला, निराला वगैरह काम करते थे। उसमें बहुत व्यंग्य है। उसकी फाइल उठाकर देखिए उसमें व्यंग्य ही व्यंग्य है। प्रतापनारायण मिश्र, बालमुकुंद गुप्त वगैरह व्यंग्य के कालम लिखते थे, जैसे मैं भी व्यंग्य के कॉलम लिखता हूं। तो परंपरा है ही, उसी परंपरा में नवयुग की चेतना के अनुकूल और अपनी शैली से उसमें और जुड़कर तथा परंपराओं को तोड़कर मैंने व्यंग्य लिखा और हिंदी में व्यंग्य, लिखने वाले बहुत अधिक हैं, इसमें कोई शक नहीं, किसी अन्य भाषा में इतने अधिक नहीं होंगे शायद।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपनी कोई भी पुस्तक प्रकाशित रुप में कभी किसी को समर्पित नहीं की, जबकि विश्व की सभी भाषाओं में इसकी अत्यंत समृद्ध परंपरा मिलती है।आपके व्यक्तित्व व लेखन दोनों की अपार लोकप्रियता को देखते हुए यह बात कुछ अधिक ही चकित करती है ?
हरिशंकर परसाई------
यह समर्पण की परंपरा बहुत पुरानी है। अपने से बड़े को, गुरु को, कोई यूनिवर्सिटी में है तो वाइस चांसलर को समर्पित कर देते हैं।कभी किसी आदरणीय व्यक्ति को,कभी कुछ लोग पत्नियों को भी समर्पित कर देते हैं। कुछ में साहस होता है तो प्रेमिका को भी समर्पित कर देते हैं। ये पता नहीं क्यों हुआ है ऐसा।कभी भी मेरे मन में यह बात नहीं उठी कि मैं अपनी पुस्तक किसी को समर्पित कर दूं।जब मेरी पहली पुस्तक छपी, जो मैंने ही छपवाई थी, तो मेरे सबसे अधिक निकट पंडित भवानी प्रसाद तिवारी थे, अग्रज थे, नेता थे, कवि थे,, साहित्यिक बड़ा व्यक्तित्व था, उनसे मैंने टिप्पणी तो लिखवाई किन्तु मैंने समर्पण में लिखा-'उनके लिए,जो डेढ़ रुपया खर्च करके खरीद सकते हैं।ये समर्पण है है मेरी एक किताब में। लेकिन वास्तव में यह है वो- उनके लिए जिनके पास डेढ़ रुपए है और जो यह पुस्तक खरीद सकते हैं, उस समय इस पुस्तक की कीमत सिर्फ डेढ़ रुपए थी।सस्ता जमाना था, पुस्तक भी करीब सवा सौ पेज की थी। इसके बाद मेरे मन में कभी आया ही नहीं कि मैं किसी के नाम समर्पित कर दूं अपनी पुस्तक। जैसा आपने कहा कि मैंने तो पाठकों के लिए लिखा है, तो यह समझ लिया जाये कि मेरी पुस्तकें मैंने किसी व्यक्ति को समर्पित न करके तमाम भारतीय जनता को समर्पित कर दी है।
जय प्रकाश पाण्डेय---
आपके लेखन में प्रारंभ से लोक शिक्षण पर बहुत बल है। कई लोगों का मानना है कि इस उद्देश्य के प्रबल आग्रह के कारण आपके लेखन की साहित्यिक महत्ता या गरिमा क्षतिग्रस्त हुई है, आत्म समीक्षा के एकांत क्षणों में क्या आपको भी ऐसा लगता है ?
हरिशंकर परसाई--
एक तो इसका कारण यह हो सकता है कि मैं 10-12 साल शिक्षक रहा हूं, तो जो मेरे अंदर शिक्षक था, वह मरा नहीं या मैं शिक्षक का ही रोल प्ले करता रहा। मेरे लेखन में लोक शिक्षण है और मैं अभी भी ये मानता हूं कि लोक शिक्षण बहुत आवश्यक है, जो देश में वर्तमान हालात चल रहे हैं उसके लिए मैं उसी बात को दोषी मानता हूं कि राजनैतिक दलों ने, ट्रेड यूनियन्स ने, विश्वविद्यालयों ने लोक शिक्षण नहीं कराया। लोगों को शिक्षित नहीं किया गया। वैज्ञानिक दृष्टि नहीं दी गई, तर्क नहीं दिए गए। इतिहास सही ढंग से नहीं समझाया गया। समाज की रचना को ठीक से नहीं समझाया गया। अन्धविश्वासों को नहीं मिटाया गया, पुरानी परंपराओं के प्रति विरक्ति नहीं पैदा की गई। ये लोक शिक्षण होता है जो वास्तव में नहीं हुआ, हमारे देश में लोक शिक्षण नहीं हुआ, इसलिए हम आज भी देख रहे हैं कि हमारे देश के ऊपर संकट ही संकट हैं। लोक शिक्षण दो प्रकार का होता है, एक तो सीधा, स्पष्ट और दूसरा परोक्ष या सांकेतिक। मेरे लेखन में कहीं शायद सीधा डायरेक्ट कोई शिक्षण आ गया हो, कोशिश मैंने यही की है कि परोक्ष रूप से शिक्षण करूं, अपने व्यंग्य के द्वारा या स्थितियों का चित्रण करके मैं रख दूं और उससे पढ़ने वाला शिक्षक हो जावे, ये मैंने कोशिश की। अब इससे मेरे साहित्य की मौलिकता घटी या बढ़ी है, मैं नहीं कह सकता हूं, हो सकता है घटी हो, मान लेता हूं, परन्तु मैं लोक शिक्षण को साहित्य में आवश्यक मानता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय---
ऐसा प्राय: देखने में आया है कि आप अपनी रचना में जहां सबसे मूल्यवान कथ्य का सम्प्रेषण कर रहे होते हैं, वहां बहुत कम देर रुकते हैं, इन क्षणों में आपका गद्य अचानक बहुत संक्षिप्त और उसकी गति अत्याधिक त्वरित हो उठती है। एक लेखक के रूप में अपने इन उत्कर्ष क्षणों में स्वंय को सचेत रूप में अनुपस्थित कर देने का यह गुण आपकी मानवीय विनम्रता का सहज गुण है या सयास निर्मित एक रचना कौशल ?
हरिशंकर परसाई---
यह मेरी विनम्रता नहीं है,बात असल में ये है कि ये कौशल भी नहीं है। मैं वास्तव में उस बिंदु तक आते-आते परिस्थितियों का, वक्तव्यों का ऐसा वातावरण निर्मित कर लेता हूं कि उनमें से इस प्रकार की अभिव्यक्ति निकलनी ही चाहिए,जो कि निष्कर्ष रूप में होती है, लेकिन उसकी भूमिका मैं लम्बी बनाता हूं, और उस लम्बी भूमिका के बाद उस निष्कर्ष का क्षण आता है, यदि निष्कर्ष के उस क्षण को मैं लम्बा कर दूं तो मेरे लेखन का प्रभाव नष्ट हो जावेगा। मुझे संक्षिप्त में ही उसे एकदम से कहकर आगे बढ़ जाना चाहिए,कारण कि पाठक का दिमाग तो तैयार हो गया तब तक। तो एक दो वाक्य चलते फिरते कह देने भर से वह पूरी की पूरी बात ग्रहण कर लेता है। यदि मैं उसको ४-६-८ वाक्यों में समझाऊं तो इसका मतलब कि मेरी पहले की बनाई भूमिका बेकार हो जावेगीऔर उसका प्रभाव भी नहीं रह पायेगा, इसलिए मैं ऐसा करता हूं।
जय प्रकाश पाण्डेय--
आपने अपनी कोई भी पुस्तक प्रकाशित रूप में कभी किसी को समर्पित नहीं की, जबकि विश्व की सभी भाषाओं में इसकी समृद्ध परंपरा मिलती है। आपके व्यक्तित्व व लेखन दोनों की अपार लोकप्रियता को देखते हुए यह बात कुछ अधिक ही चकित और विस्मित करती है?
हरिशंकर परसाई--
यह समर्पण की परंपरा बहुत पुरानी है। अपने से बड़े को, गुरु को, कोई यूनिवर्सिटी में है तो वाइस चांसलर को समर्पित कर देते हैं। कभी किसी आदरणीय व्यक्ति को,कभी कुछ लोग पत्नियों को भी समर्पित कर देते हैं हैं। कुछ में साहस होता है तो प्रेमिका को भी समर्पित कर देते हैं। ये पता नहीं क्यों हुआ है ऐसा। कभी भी मेरे मन में यह बात नहीं उठी कि मैं अपनी पुस्तक किसी को समर्पित कर दूं, जब मेरी पहली पुस्तक छपी, जो मैंने ही छपवाई थी, तो मेरे सबसे अधिक निकट पंडित भवानी प्रसाद तिवारी थे, अग्रज थे, नेता थे, कवि थे, साहित्यिक बड़ा व्यक्तित्व था, उनसे मैंने टिप्पणी तो वह लिखवाई किन्तु मैंने समर्पण में लिखा- "उनके लिए, जो डेढ़ रुपया खर्च करके खरीद सकते हैं।"
तो ये समर्पण है मेरी एक किताब में।
लेकिन वास्तव में यह है वो - उनके लिए जिनके पास डेढ़ रुपया है और जो यह पुस्तक खरीद सकते हैं,उस समय इस पुस्तक की कीमत सिर्फ डेढ़ रुपए थी।सस्ता जमाना था, पुस्तक भी करीब सवा सौ पेज की थी। इसके बाद मेरे मन में कभी आया ही नहीं कि मैं किसी के नाम समर्पित कर दूं। अपनी पुस्तक,जैसा आपने कहा कि मैंने तो पाठकों के लिए लिखा है, तो यह समझ लिया जाये कि मेरी पुस्तक मैंने किसी व्यक्ति को समर्पित न करके तमाम भारतीय जनता को समर्पित कर दी है।
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