इन दिनों हर कोई जल्द से जल्द सफलता हासिल करना चाहता है, लेकिन सफलता का कोई शॉर्टकट फार्मूला नहीं है। इसके लिए सही दिशा में अथक परिश्रम, सेल्फ मोटिवेशन के अलावा, बदलते वक्त के साथ-साथ नई तकनीकी से भी खुद को अपडेट करके सफलता हासिल की जा सकती है। और ऐसा करके ही आप आज के कॉम्पिटेटिव वर्क-प्लेस में सफलता के बारे में सोच सकते हैं।
यदि आप कुछ खास बातों पर अमल करें, तो सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।वही करें, जो पंसद होहर प्रोफेशनल की यह इच्छा होती है कि उसे ऐसा काम मिले, जिसमें संतुष्टि हो, चुनौतियां हों आगे बढ़ने के अवसर हों और पैसे भी हों। लेकिन कुछेक लोग ही ऐसे होते हैं, जिन्हें इस तरह का अवसर मिलता है। मनोवैज्ञानिक अशुम गुप्ता कहती है कि कामयाबी आपकी रुचि, दृढ़ इच्छाशक्ति और स्वयं के प्रति आपकी प्रतिबद्धता पर ही निर्भर करती है। इसलिए आप वही काम करें, जो आपकी पंसद हो। सफल होने के लिए जरूरी है कि सबसे पहले अपनी च्वाइस तय करें और एक निश्चित लक्ष्य बनाएं, फिर पूरे मनोयोग से अपने कार्य में लग जाएं।
दरअसल, कामयाबी की कहानी यहीं से शुरू होती hai , safalta कहीं ओर नहीं, बल्कि आपके विश्वास और सिद्धांतों पर भी निर्भर करती है। अपने मौलिक गुणों, विश्वास और रुचियों को समझें और उन्हें प्राथमिकता दें। क्योंकि यही आपको सफलता की राह दिखाएंगी, मंजिल तक ले जाएंगी और समझाएंगी कि सफलता आपके दृष्टिकोण और सिद्धांतों में निहित hai । saphalataa एक चरणबद्ध प्रक्रिया है। इसलिए छोटी-छोटी उपलब्धियों के बल पर आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। इसलिए अगर आप कोई बड़ा काम नहीं कर पा रहे हैं, तो छोटे या सामान्य काम से ही शुरूआत कर सकते हैं।
सच तो यह है कि अपनी रुचि के क्षेत्र में यह सामान्य काम ही सफलता की ओर आपका पहला कदम होगा। प्रत्येक अगला कदम आपको अपने लक्ष्य के नजदीक ले जाएगा। क्योंकि बूंद-बूंद से ही तालाब भरता है। आपके वे छोटे-छोटे कदम एक दिन बड़ी दूरी तय कर लेंगे।सीखने की lalk की प्रक्रिया कभी बंद नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यही आपको अनुभव और संतुष्टि देती है। अपनी असफलताओं से भी सबक लें। क्योंकि असफलता सबसे महत्वपूर्ण शिक्षक है।
दरअसल यही बताता है कि कमी कहां है, जरूरत किस बात की है और आपसे क्या गलती हुई है।असफलताओं को न जाने दे बेकारअसफलता तब बेकार चली जाती है जब आप उस पर पछताने के अलावा कुछ सीखने का प्रयास ही नहीं करते हैं। तब तक यह हार खुद को बार-बार दोहराती है जब तक आप उससे सबक लेकर खुद में सुधार नहीं लाते हैं। हो सकता है, व्यक्ति असफलता या मुश्किलों से डरे, लेकिन ये भी सफलता के ही रास्ते हैं।याद रखें, सफलता के लिए किया गया प्रयत्न नई सोच एवं नया दृष्टिकोण विकसित करता है।
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_जय प्रकाश पाण्डेय
Monday, March 22, 2010
'' कुछ काम करो ''
स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते है । हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रक्रति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा , '' फल हीन अंजीर '' की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि बिना काम स्त्री -पुरुष झगड़ालू , असंतुस्ट ,अधीर और चिडचिडे हो जाते है चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें , जो यह शिकायत करे कि '' मेरे पास कोई काम नहीं है '' या '' मुझसे काम नहीं बनता '' उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए , उसके चेहरे पर थकावट -सी छाई हुई होगी ...... उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा । कई लोग ऐसा सोचते है कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान है या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है ,मनुष्यता का , या पौरुष का अपमान है , यह पुर्णतः अप्राक्र्तिक और लोकिक नियमो के विपरीत है ..... अपनी रोजी -रोटी के लिए thodee कमाई कर के अपने अन्दर अहं पल लेना ......बाल -बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए ........ सोचो तो जरा ...... अरे भाई कुछ काम करो । कुछ काम करो .... जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो ............ । तो कुछ तो ऐसा 'काम' कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रसस्त हो.... जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल -पहल और खुशियाली मिटटी में मिल जायेगी ... अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम ... काम ..और श्रम ही वास्तव में असली देवता है , और यही सिटिजन एस बी आई का मूल ध्येय है .........--जय प्रकाश पाण्डेय
Monday, March 1, 2010
AJAB-GAJAB RECOVERY
किसी ने ठीक ही कहा है कि कर्ज फर्ज और मर्ज को कभी नहीं भूलना चाहिए , लेकिन इस आदर्श वाक्य को लोग पढकर टाल देते है । कर्ज लेते समय तो उनका व्यवहार अत्यंत मृदु होता है , लेकिन मतलब निकलने के बाद वे नजरें चुराने लगते है , कई ऐसे लोग है जो बैंक से काफी लोन लेकर उसे पचा जाते है , लेकिन ऐसे भी लोगों की कमी नहीं जो कर्ज , फर्ज और मर्ज का बराबर ख्याल रखते है । नारायणगंज (मंडला) एरिया के एक कर्जदार ने अपनी मृत्यु के बाद भी बैंक से लिए कर्ज को चुकाने सपने में अपने परिजन को प्रेरित किया जिससे उसके द्रारा२० साल पहले लिया कर्ज पट गया लोगों ने दातों तले उगलियाँ दबा कर हतप्रद रह गए ।
स्टेट बैंक नारायणगंज के शाखा प्रबन्धक के रूप में इस मामले का खुलासा करने में तनिक हिचक और आश्चर्य के साथ सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा था , ''किसी से बताना नहीं पर ऐसा अनुभव हुआ है '' ........यह बात फेलते - फेलते खबरनबीसों तक पहुच गई , फिर देनिक भास्कर और देनिक नई दुनिया ने इस खबर को प्रमुखता से छापा,
खबर यह थी कि २० साल पहले एक ने बैंक से कर्ज लिया था , लेकिन कर्ज चुकाने के पहले ही वह परलोक सिधार गया ............ । उसके बेटे ने एक दिन बैंक में आकर अपने पिता द्वारा लिए गए कर्ज की जानकारी ली , बेटे ने मुझे बताया कि उसके पिता बार-बार सपने में आते है और बार-बार यही कहते है कि बेटा बैंक का कर्ज चूका दो ,पहले तो मुझे और शाखा के स्टाफ को आश्चर्य हुआ और बात पर भरोसा नहीं हुआ , लेकिन उसके बेटे के चहरे के दर्द और भावना पर गौर करते हुए अप्लेखित खातों की सूची में उसके पिता का नाम मिल ही गया ,उसकी बात पर कुछ यकीन भी हुआ , फिर उसने बताया कि पिता जी की बहुत पहले मृत्यु हो गई थी ,पर कुछ दिनों से हर रात को पिता जी सपने में आकर पूछते है की कर्ज का क्या हुआ ? और मेरी नींद खुल जाती है फिर सो नहीं पता , लगातार २० दिनों से नहीं सो पाया हूँ ,आज किसी भी हालत में पिता जी का कर्ज चूका कर ही घर जाना हो पायेगा । अधिक नहीं मात्र १६५००/ का हिसाब ब्याज सहित बना , उसने हँसते -हँसते चुकाया और बोला - आज तो सच में गंगा नहए जैसा लग रहा है ,
अगले दो-तीन दिनों तक मेनें उसकी खोज -खबर ली , उसने बताया की कर्ज चुकने के बाद पिता जी बिलकुल भी नहीं दिखे , उस दिन से उसे खूब नीदं आ रही है ,
इस तरह एक सिटिज़न मृतात्मा की प्रेरणा से जहाँ बैंक की वसूली हो गई वहीँ एक पुत्र पित्र्य-लोन से मुक्त हो गया ,इस खबर को तमाम जगहों पढ़ा गया और कई दूर-दराज शाखों की २०-२० साल पुरानी अप्लेखित खातों में खूब वसूली हुई । लोग याद करते है की स्टेट बैंक में ऐसे सिटिज़न कर्जदार भी होते है जो मरकर भी अपने कर्ज को चुकाते हुए बैंक की वसूली का माहौल भी बनाते है ...... उस मृतात्मा को साधुवाद .... सलाम ...
ये संयोग भी है और मजे की बात भी , की जिस साल इस सिटिज़न मृतात्मा का ये वसूली अभियान का समाचार अख़बारों के मार्फ़त मंडला जिले में फेला , उस साल मध्य प्रदेश में आर आर सी दायर खातों (अप्लेखित खातों ) में सबसे अधिक वसूली हेतु मंडला जिले को प्रथम पुरस्कार हेतु शासन ने चुना । ...... धन्य हो सिटिज़न मृतात्मा ........., तुम्हे सलाम ......
स्टेट बैंक नारायणगंज के शाखा प्रबन्धक के रूप में इस मामले का खुलासा करने में तनिक हिचक और आश्चर्य के साथ सहज रूप से विश्वास नहीं हो रहा था , ''किसी से बताना नहीं पर ऐसा अनुभव हुआ है '' ........यह बात फेलते - फेलते खबरनबीसों तक पहुच गई , फिर देनिक भास्कर और देनिक नई दुनिया ने इस खबर को प्रमुखता से छापा,
खबर यह थी कि २० साल पहले एक ने बैंक से कर्ज लिया था , लेकिन कर्ज चुकाने के पहले ही वह परलोक सिधार गया ............ । उसके बेटे ने एक दिन बैंक में आकर अपने पिता द्वारा लिए गए कर्ज की जानकारी ली , बेटे ने मुझे बताया कि उसके पिता बार-बार सपने में आते है और बार-बार यही कहते है कि बेटा बैंक का कर्ज चूका दो ,पहले तो मुझे और शाखा के स्टाफ को आश्चर्य हुआ और बात पर भरोसा नहीं हुआ , लेकिन उसके बेटे के चहरे के दर्द और भावना पर गौर करते हुए अप्लेखित खातों की सूची में उसके पिता का नाम मिल ही गया ,उसकी बात पर कुछ यकीन भी हुआ , फिर उसने बताया कि पिता जी की बहुत पहले मृत्यु हो गई थी ,पर कुछ दिनों से हर रात को पिता जी सपने में आकर पूछते है की कर्ज का क्या हुआ ? और मेरी नींद खुल जाती है फिर सो नहीं पता , लगातार २० दिनों से नहीं सो पाया हूँ ,आज किसी भी हालत में पिता जी का कर्ज चूका कर ही घर जाना हो पायेगा । अधिक नहीं मात्र १६५००/ का हिसाब ब्याज सहित बना , उसने हँसते -हँसते चुकाया और बोला - आज तो सच में गंगा नहए जैसा लग रहा है ,
अगले दो-तीन दिनों तक मेनें उसकी खोज -खबर ली , उसने बताया की कर्ज चुकने के बाद पिता जी बिलकुल भी नहीं दिखे , उस दिन से उसे खूब नीदं आ रही है ,
इस तरह एक सिटिज़न मृतात्मा की प्रेरणा से जहाँ बैंक की वसूली हो गई वहीँ एक पुत्र पित्र्य-लोन से मुक्त हो गया ,इस खबर को तमाम जगहों पढ़ा गया और कई दूर-दराज शाखों की २०-२० साल पुरानी अप्लेखित खातों में खूब वसूली हुई । लोग याद करते है की स्टेट बैंक में ऐसे सिटिज़न कर्जदार भी होते है जो मरकर भी अपने कर्ज को चुकाते हुए बैंक की वसूली का माहौल भी बनाते है ...... उस मृतात्मा को साधुवाद .... सलाम ...
ये संयोग भी है और मजे की बात भी , की जिस साल इस सिटिज़न मृतात्मा का ये वसूली अभियान का समाचार अख़बारों के मार्फ़त मंडला जिले में फेला , उस साल मध्य प्रदेश में आर आर सी दायर खातों (अप्लेखित खातों ) में सबसे अधिक वसूली हेतु मंडला जिले को प्रथम पुरस्कार हेतु शासन ने चुना । ...... धन्य हो सिटिज़न मृतात्मा ........., तुम्हे सलाम ......
CHUTKA KI ROTI
हेड आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकविरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... ।
तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... ।
दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।
कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?
वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा .................
--जय प्रकाश पाण्डेय
मायक्रो फायनेंस शाखा
तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... ।
दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।
कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?
वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा .................
--जय प्रकाश पाण्डेय
मायक्रो फायनेंस शाखा
GAR HOSHLE BULAND HON........
गरीब अन्पड महिलाएं , जो बैंक विहीन आबादी में निवास करती है , जो लोन लेने के लिए साहूकारों के नाज- नखरों को सहन करती हुई लोन लेती थीं , जो बैंकों से लोन लेने के बारे में स्वप्न में भी नहीं सोच सकतीं थी , ऐसी महिलाओं के आर्थिक उन्नयन में माइक्रो फाइनेंस की अवधारणा मील का पत्थर साबित हो रही है , किसी ने कहा है '' कमीं नहीं है कद्र्ता की ....कि अकबर करे कमाल पैदा .........इस भाव को स्व सहायता समूह से जुडी महिलाओं ने बता दिया है कि '' गर होंसले बुलंद है तो पहाड़ में भी रास्ते बन जाते है ........
स्टेट बैंक की माइक्रो फाइनेंस शाखा ने होशंगाबाद के एक गेर सरकारी संगठन '' युक्ति समाज सेवा सोसायटी को २५ लाख का लोन दिया था ,लोन इन रिमोट एरिया एवं बैंक विहीन आबादी के स्व सहायता समूह की महिलाओं के आर्थिक उन्नयन हेतु दिया गया था , लोन राशी की उपयोगिता के सर्वे , जांच एवं इन महिलाओं की इनकम जेनेरितिंग गतिविधियों के अवलोकन , मार्गदर्शन हेतु मेनेजर पाण्डेय द्वारा किये गए सर्वे से लगा कि इस आवधारनासे होशंगाबाद जिले की हजारों महिलाओं में न केवल आत्म विश्वास पैदा हुआ बल्कि इन स्माल लोन ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया , बेदर्द समाज और अभावों के बीच कुछ कर दिखाना आसान नहीं पर इन महिलाओं के होसले बुलंद है .....
होशंगाबाद के मलाखेदी में एक खपरेल मकान में चाक पर घड़े को आकार देती ३० साल की बिना पदीलिखी लखमी प्रजापति को भान भी नहीं होगा कि वह अपनी जैसी उन हजारों महिलाओं के लिए उदाहरन हो सकती है जो अभावों के आगे घुटने टेक देती है , दो बच्चों की माँ ल्क्स्मी ने जब देखा कि रेतमजदूर पति की आय से कुछ नहीं हो सकता तो उसने बचपन में अपने पिता के यहाँ देखा कुम्हारी का काम करने का सोचा , काम इतना आसान नहीं था लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, महीनों की लगन के बाद उसने ये काम सीखा और आज वह दो सो रूपये रोज कमा रही है इस प्रकार स्व सहयता समूह से जुड़ कर अपने परिवार का उन्नयन कर देवर की शादी का खर्चा भी उठाया , बच्चे इंग्लिश स्कूल में जाने लगे है ...... शमा विशकर्मा भी ऐसी ही जीवत वाली महिला है जिसने बिना पदेलिखे रहते हुए भी haar नहीं मानी और अपने पेरों पर खड़ी हो गई , वह बताती है कि पहले रेशम केंद्र में मजदूरी करने जाती थी तो ७०० / मिलते थे लेकिन एक दिन युक्ति समाज ने रेशम कत्त्ने की मशीन का लोन दिया तो मशीन घर आ गई मशीन घर पर होने से यह फायदा हुआ कि काम के घंटे ज्यादा मिल गए और वह ३०००/ से ज्यादा कमाने लगी है ..... अंधियारी गाँव की मंजू चौधरी और बेरखेडी गाँव की लाक्स्मी ने तो सहकारिता की वह मिसाल पेश की जिसकी जितनी तारीफ की jaay कम है , गाँव की अपने जैसी दस मलिलाओं ने स्व सहयता समूह बनाकर लोन लिया फिर सिकमी (लीज) पर खेती कर रहीं है समूह की सब महिलाएं खेतों में हल चलने के आलावा वह सब काम भी करती है जो अभी तक पुरुस करते थे ........इन सब महिलाओं का कहना है कि ....गरीबी अशिक्छा कुपोषण आदि की समस्याओं से सब कुछ डूबने की निराश भावना से उबरने के लिए जरूरी है कि गाँव एवं शहरों में हो रहे बदलाव का सकारात्मक रूख उजागर किया जाए .........
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जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फायनेंस शाखा भोपाल
स्टेट बैंक की माइक्रो फाइनेंस शाखा ने होशंगाबाद के एक गेर सरकारी संगठन '' युक्ति समाज सेवा सोसायटी को २५ लाख का लोन दिया था ,लोन इन रिमोट एरिया एवं बैंक विहीन आबादी के स्व सहायता समूह की महिलाओं के आर्थिक उन्नयन हेतु दिया गया था , लोन राशी की उपयोगिता के सर्वे , जांच एवं इन महिलाओं की इनकम जेनेरितिंग गतिविधियों के अवलोकन , मार्गदर्शन हेतु मेनेजर पाण्डेय द्वारा किये गए सर्वे से लगा कि इस आवधारनासे होशंगाबाद जिले की हजारों महिलाओं में न केवल आत्म विश्वास पैदा हुआ बल्कि इन स्माल लोन ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया , बेदर्द समाज और अभावों के बीच कुछ कर दिखाना आसान नहीं पर इन महिलाओं के होसले बुलंद है .....
होशंगाबाद के मलाखेदी में एक खपरेल मकान में चाक पर घड़े को आकार देती ३० साल की बिना पदीलिखी लखमी प्रजापति को भान भी नहीं होगा कि वह अपनी जैसी उन हजारों महिलाओं के लिए उदाहरन हो सकती है जो अभावों के आगे घुटने टेक देती है , दो बच्चों की माँ ल्क्स्मी ने जब देखा कि रेतमजदूर पति की आय से कुछ नहीं हो सकता तो उसने बचपन में अपने पिता के यहाँ देखा कुम्हारी का काम करने का सोचा , काम इतना आसान नहीं था लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी, महीनों की लगन के बाद उसने ये काम सीखा और आज वह दो सो रूपये रोज कमा रही है इस प्रकार स्व सहयता समूह से जुड़ कर अपने परिवार का उन्नयन कर देवर की शादी का खर्चा भी उठाया , बच्चे इंग्लिश स्कूल में जाने लगे है ...... शमा विशकर्मा भी ऐसी ही जीवत वाली महिला है जिसने बिना पदेलिखे रहते हुए भी haar नहीं मानी और अपने पेरों पर खड़ी हो गई , वह बताती है कि पहले रेशम केंद्र में मजदूरी करने जाती थी तो ७०० / मिलते थे लेकिन एक दिन युक्ति समाज ने रेशम कत्त्ने की मशीन का लोन दिया तो मशीन घर आ गई मशीन घर पर होने से यह फायदा हुआ कि काम के घंटे ज्यादा मिल गए और वह ३०००/ से ज्यादा कमाने लगी है ..... अंधियारी गाँव की मंजू चौधरी और बेरखेडी गाँव की लाक्स्मी ने तो सहकारिता की वह मिसाल पेश की जिसकी जितनी तारीफ की jaay कम है , गाँव की अपने जैसी दस मलिलाओं ने स्व सहयता समूह बनाकर लोन लिया फिर सिकमी (लीज) पर खेती कर रहीं है समूह की सब महिलाएं खेतों में हल चलने के आलावा वह सब काम भी करती है जो अभी तक पुरुस करते थे ........इन सब महिलाओं का कहना है कि ....गरीबी अशिक्छा कुपोषण आदि की समस्याओं से सब कुछ डूबने की निराश भावना से उबरने के लिए जरूरी है कि गाँव एवं शहरों में हो रहे बदलाव का सकारात्मक रूख उजागर किया जाए .........
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जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फायनेंस शाखा भोपाल
SAMAY OT BALWAN
समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक ,चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक , कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जातसदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात
कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।
समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैंं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
अब सिटिजन एस बी आई ने आपको जगाया है .... '' तो मत चूको चोहान '' अब जीवन के बचे समय को अपना बना लो ...... '' काल करे तो आज कर , आज करे तो अब '' की ओज भरी भावना से खुद को सवारों , समाज को कुछ अच्छा दो , देश के लिए कुछ अच्छा कर के दिखा दो ........... जय राम जी की ................
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जातसदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात
कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।
समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैंं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
अब सिटिजन एस बी आई ने आपको जगाया है .... '' तो मत चूको चोहान '' अब जीवन के बचे समय को अपना बना लो ...... '' काल करे तो आज कर , आज करे तो अब '' की ओज भरी भावना से खुद को सवारों , समाज को कुछ अच्छा दो , देश के लिए कुछ अच्छा कर के दिखा दो ........... जय राम जी की ................
EK ROCHAK PAHAL
पन्ना जिले के गुनौर विकासखण्ड में छोटा सा ग्राम है ‘‘बम्हौरी’’ । लगभग डेढ़ सौ परिवारों वाले इस ग्राम के ग्रामीण मुख्यतः खेतिहर मजदूरी एवं मजदूरी पर ही निर्भर हैं। घर गृहस्थी एवं चूल्हा चौका सम्भालती महिलाएं कभी कभार मजदूरी पर जाकर परिवार की आर्थिक जरुरतों को पूरा करने मे सहयोग करतीं लेकिन अक्सर ऐसा होता कि जब भी कोई बीमार हो गया या मेहमान आ गया या त्योहार आया घर मे खर्च करने के लिए फूटी कौड़ी भी न होती।
ऐसे मे राजपूत मुहल्ले की कुछ महिलाओं को तेजस्विनी कार्यक्रम की जानकारी हुई एवं आपसी सलाह करके 17 सखी सहेलियों ने ठान लिया मुष्किलों एवं परेषानियों से स्वयं ही लोहा लेने एवं कुछ नया कर गुजरने का। इस तरह गठित हुआ ‘‘रजनी तेजस्विनी महिला स्वसहायता समूह’’।
प्रत्येक बैठक मे समूह की समस्त गतिविधियां संचालित करने के साथ- साथ किसी एक सामाजिक समस्या या व्यवस्था पर अवष्य ही चर्चा होती ऐसे ही नीम चबूतरे पर आयोजित बैठक मे मुद्दा था बच्चों की पढ़ाई का राधा बाई का कहना था मेरे बच्चे एक घण्टे मे ही स्कूल से लौट आतें हैं तो मीरा का कहना था कि मेरी बेटी को स्कूल मे खाना नही मिलता और पार्वती बोली कि मास्टर साहब समय से स्कूल नही आते। तय हुआ कि क्यों न आज स्वयं स्कूल मे चलकर देखा जाए कि हमारे बच्चे आखिर किस तरह पढ़ लिख रहे हैं और लगभग दस मिनट मे ही महिलाओं का काफिला पहुंच गया स्कूल मे।
स्कूल का नजारा देखकर सब के सब चकित! मास्टर साहब कक्षाओं मे नही, बच्चे धूल मे खेल रहे थे और लड़झगड़ रहे थे, किताबें फैली पड़ी थीं और पानी आदि की कोई व्यवस्था नही थी। स्कूल स्टाफ ने पहली बार स्कूल मे इतनी महिलाओं को देखा तो उन्हे सूझा ही नही कि वे क्या करें, फिर आनन - फानन मे सभी कक्षाओं की ओर भागे। महिलाओं ने एक - एक क्लास को देखा, मध्यान्न भोजन व्यवस्था देखी, पानी पीने का स्थान देखा और पाया कि सब कुछ अव्यवस्थित है यहां तक कि स्कूल मे छात्र छात्राओं के लिए पेषाबघर भी नही है। स्कूल की सारी अव्यवस्थाओं के लिए स्कूल स्टाफ विस्तृत बात की एवं अगले भ्रमण तक व्यवस्थाओं को सुधारने का निवेदन किया। स्कूल स्टाफ को महिलाओं का व्यवस्थाओं को सुधारने का यह तरीका काफी प्रभावषाली लगा एवं उन्होंने व्यवस्थाओं को सुधारने का वचन दिया।
समूह की अगली बैठक मे महिलाओं ने पुनः स्कूल का भ्रमण किया और पाया कि व्यवस्थाएं पूर्णतया ठीक तो नही हुईं लेकिन आंषिक सुधार अवष्य आया है जैसे कि षिक्षक समय पर स्कूल आ चुके थे कक्षाएं चल रहीं थीं और मध्यान्न भोजन बनाया जा रहा था। महिलाओं को पूर्ण सन्तुष्टि तो नही मिली लेकिन अपनी संगठन शक्ति की सफलता का विष्वास जरुर हो गया। इसी विष्वास के दम पर वे कहतीं हैं कि हम भले ही न पढ़ सके पर बच्चों को जरुर पढ़ाएंगें और धीरे - धीरे एक दिन जरुर वे गांव की सारी व्यवस्थाओं को सुधार पाने मे सफल हो सकेंगीं।
MICRO FINANCE BRANCH
Bhopal
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