इस कविता में सूरज इसलिए ,
ताकि ' सुबह ' का एहसास रहे ,
इस कविता में ख्वाब इसलिए ,
ताकि उम्मीद का सिलसिला बने ,
इस कविता में 'याद' इसलिए ,
ताकि जीवन में रोमांच मिले ,
इस कविता में ' आग ' इसलिए ,
ताकि सबको परम सुख मिले ,
इस कविता में 'आवाज ' इसलिए ,
ताकि जागते रहो की मुनादी मिले ,
इस कविता में संतोष इसलिए ,
ताकि सबको भरपूर सुख मिले ,
इस कविता में सिटिजन इसलिए ,
ताकि सच्चे अच्छे को अधिकार मिले ,
इस कविता में ''ओबामा ''इसलिए ,
ताकि 'परिवर्तन ' की याद रहे ,
-------०---------
--जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
Sunday, March 28, 2010
Saturday, March 27, 2010
'' सवालों के तूफान ''
चार माह पहले झाबुआ से वापस लोटते समय धार के पास आगे -आगे भाग रहे ट्रक के पीछे लिखा था ,
'' कृष्ण करें तो खेल ,
हम करें तो जेल ,''
ट्रक पर लिखे इन शब्दों की पीड़ा को लाखों ने झेला होगा /झेल रहे होंगे , पर अब चिंता की बात नहीं ....
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फेसले ''लिव इन रिलेशनशिप '' में ट्रक में लिखे शब्दों की पीड़ा में सबको राहत
दे दी है , अब ' कृष्ण और हम सब'' एक हो गए है ,
-जय प्रकाश पाण्डेय
'' कृष्ण करें तो खेल ,
हम करें तो जेल ,''
ट्रक पर लिखे इन शब्दों की पीड़ा को लाखों ने झेला होगा /झेल रहे होंगे , पर अब चिंता की बात नहीं ....
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फेसले ''लिव इन रिलेशनशिप '' में ट्रक में लिखे शब्दों की पीड़ा में सबको राहत
दे दी है , अब ' कृष्ण और हम सब'' एक हो गए है ,
-जय प्रकाश पाण्डेय
'' पहल -सिटिजनशिप ''
जीवन है चलने का नाम ..... जो लोंग परेशानी भरी जिंदिगी जीते है उनकी संवेदनाये मरती नहीं है , उनकी संवेदना विपरीत परिस्थतियों से लड़ने की प्रेरणा देती है और वे अन्य के लिए भी प्रेरक बन जाते है , उनकी सहज सरल बातें भी ख़ुशी का पैगाम बनकर उस माहौल में संवेदना , सेवा और सामाजिकता पैदा कर देती है , नारायणगंज शाखा में दूर - अंचल से खाता खोलने आये ''रंगेया'' ने भी कुछ ऐसी छाप छोडी ........
''रंगेया '' जब खाता खोलने आया तो बेंकवाले ने पूछा - ''रंगेया '' खाता क्यों खुलवा रहे हो ?
''रंगेया '' ने बताया - साब दस कोस दूर बियाबान जंगल के बीच हमरो गाँव है घास -फूस की टपरिया और घरमे दो-दो बछिया ....घर की परछी में एक रात परिवार के साथ सो रहे थे तो कालो नाग आके घरवाली को डस लियो , रात भर तड़फ -तडफ कर बेचारी रुकमनी मर गई ...... मरते दम तक भुखी प्यासी दोनों बेटियों की चिंता करती रही ........ सांप के काटने से घरवाली मरी तो सरकार ने ये पचास हजार रूपये का चेक दिया है , तह्सीलवाला बाबु बोलो कि बैंक में खाता खोलकर चेक जमा कर देना रूपये मिल जायेगे ..... सो खाता की जरूरत आन पडी साब ! .... बैंक वाले ने पूछा - सांप ने काटा तो शहर ले जाकर इलाज क्यों नहीं कराया ?
''रंगेया '' बोला - कहाँ साब !'' गरीबी में आटा गीला ''.... शहर के डॉक्टर तो गरीब की गरीबी से भी सौदा कर लेते है ,वो तो भला हो सांप का ... कि उसने हमारी गरीबी की परवाह की और रुकमनी पर दया करके चुपके से काट दियो , तभी तो जे पचास हजार मिले है खाता न खुलेगा ...... तो जे भी गए ............ अब जे पचास हजार मिले है तो कम से कम हमारी गरीबी तो दूर हो जायेगी , दोनों बेटियों की शादी हो जयेहे और घर को छप्पर भी सुधर जाहे ,जे पचास हजार में से तहसील के बाबु को भी पांच हजार देने है बेचारे ने इसी शर्त पर जे चेक दियो है । तभी किसी ने कहा -यदि नहीं दो तो ?........... रंगेया तुरंत बोला - नहीं साब ...... हम गरीब लोंग है ''प्राण जाय पर वचन न जाही '' ...साब , यदि नहीं दूगा तो मुझे पाप लगेगा , उस से वायदा किया हूँ झूठा साबित हो जाऊँगा ....अपने आप की नजर में गिर जाऊँगा .....gareeb तो हूँ और गरीब हो जाऊँगा .......और फिर दूसरी बात जे भी है कि जब किसी गरीब को सांप कटेगा ,तो ये तहसील बाबु उसके घर वाले को फिर चेक नहीं देगा .......... रंगेया की बातों ने पूरे बैंक हाल में सिटिजनशिप का माहौल बना दिया ............ सब तरफ से आवाजे हुई .... पहले रंगेया का काम करो , भीड़ को चीरता हुआ मैंने जाकर रंगेया के हाथों सौ रूपये वाले नए पांच के पेकेट रख दिए ....... उसी पल रंगेया के चेहरे पर ख़ुशी के जो भाव प्रगट हुए वो जवां से बताये नहीं जा सकते ...... बस इतना ही बता सकते है कि पूरे हाल में खुशियों की phuljhhadiyan जरूर जल उठीं ...... हाल में खड़े लोंग कह उठे .... कि खुशियाँ हमारे आस -पास ही छुपी होती है यदि हम उनकी परवाह करे तो वे कहीं भी मिल सकती है ...........
जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
''रंगेया '' जब खाता खोलने आया तो बेंकवाले ने पूछा - ''रंगेया '' खाता क्यों खुलवा रहे हो ?
''रंगेया '' ने बताया - साब दस कोस दूर बियाबान जंगल के बीच हमरो गाँव है घास -फूस की टपरिया और घरमे दो-दो बछिया ....घर की परछी में एक रात परिवार के साथ सो रहे थे तो कालो नाग आके घरवाली को डस लियो , रात भर तड़फ -तडफ कर बेचारी रुकमनी मर गई ...... मरते दम तक भुखी प्यासी दोनों बेटियों की चिंता करती रही ........ सांप के काटने से घरवाली मरी तो सरकार ने ये पचास हजार रूपये का चेक दिया है , तह्सीलवाला बाबु बोलो कि बैंक में खाता खोलकर चेक जमा कर देना रूपये मिल जायेगे ..... सो खाता की जरूरत आन पडी साब ! .... बैंक वाले ने पूछा - सांप ने काटा तो शहर ले जाकर इलाज क्यों नहीं कराया ?
''रंगेया '' बोला - कहाँ साब !'' गरीबी में आटा गीला ''.... शहर के डॉक्टर तो गरीब की गरीबी से भी सौदा कर लेते है ,वो तो भला हो सांप का ... कि उसने हमारी गरीबी की परवाह की और रुकमनी पर दया करके चुपके से काट दियो , तभी तो जे पचास हजार मिले है खाता न खुलेगा ...... तो जे भी गए ............ अब जे पचास हजार मिले है तो कम से कम हमारी गरीबी तो दूर हो जायेगी , दोनों बेटियों की शादी हो जयेहे और घर को छप्पर भी सुधर जाहे ,जे पचास हजार में से तहसील के बाबु को भी पांच हजार देने है बेचारे ने इसी शर्त पर जे चेक दियो है । तभी किसी ने कहा -यदि नहीं दो तो ?........... रंगेया तुरंत बोला - नहीं साब ...... हम गरीब लोंग है ''प्राण जाय पर वचन न जाही '' ...साब , यदि नहीं दूगा तो मुझे पाप लगेगा , उस से वायदा किया हूँ झूठा साबित हो जाऊँगा ....अपने आप की नजर में गिर जाऊँगा .....gareeb तो हूँ और गरीब हो जाऊँगा .......और फिर दूसरी बात जे भी है कि जब किसी गरीब को सांप कटेगा ,तो ये तहसील बाबु उसके घर वाले को फिर चेक नहीं देगा .......... रंगेया की बातों ने पूरे बैंक हाल में सिटिजनशिप का माहौल बना दिया ............ सब तरफ से आवाजे हुई .... पहले रंगेया का काम करो , भीड़ को चीरता हुआ मैंने जाकर रंगेया के हाथों सौ रूपये वाले नए पांच के पेकेट रख दिए ....... उसी पल रंगेया के चेहरे पर ख़ुशी के जो भाव प्रगट हुए वो जवां से बताये नहीं जा सकते ...... बस इतना ही बता सकते है कि पूरे हाल में खुशियों की phuljhhadiyan जरूर जल उठीं ...... हाल में खड़े लोंग कह उठे .... कि खुशियाँ हमारे आस -पास ही छुपी होती है यदि हम उनकी परवाह करे तो वे कहीं भी मिल सकती है ...........
जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
'' चुटका की चुटकी ''
हेड आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकविरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... । तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... । दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा ................. (--जय प्रकाश पाण्डेय , मायक्रो फायनेंस शाखा , भोपाल )
'' आत्म -गहराई ''
सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''जीवन जितना ही ऊंचा हो जाता है, जितना कि गहरा हो। जो ऊंचा तो होना चाहते हैं, लेकिन गहरे नहीं, उनकी असफलता सुनिश्चित है। गहराई के आधार पर ही ऊंचाई के शिखर संभलते हैं। दूसरा और कोई रास्ता नहीं। गहराई असली चीज है। उसे जो पा लेता है, उन्हें ऊंचाई तो अनायास ही मिल जाती है।
सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे!
आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है? जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।
(सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन )
++++++++++++++++++
*जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे!
आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है? जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।
(सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन )
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*जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
'' सत्यम -शिवम् -सुन्दरम ''
जीवन में सत्य, शिव और सुंदर के थोड़े से बीज बोओ। यह मत सोचना कि बीज थोड़े से हैं, तो उनसे क्या होगा! क्योंकि एक बीज अपने में हजारों बीज छुपाए हुए है। सदा स्मरण रखना कि एक बीज से पूरा उपवन पैदा हो सकताहैआजकिसी ने कहा है, ''मैंने बहुत थोड़ा समय देकर ही बहुत कुछ जाना है। थोड़े से क्षण मन की मुक्ति के लिए दिये और अलौकिक स्वतंत्रता का अनुभव किया। फूलों, झरनों और चांद-तारों के सौंदर्य-अनुभव में थोड़े-से क्षण बिताये और न केवल सौंदर्य को जाना, बल्कि स्वयं को सुंदर होता हुआ भी अनुभव किया। शुभ के लिए थोड़े-से क्षण दिये और जो आनंद पाया, उसे कहना कठिन है। तब से मैं कहने लगा कि प्रभु को तो सहज ही पाया जा सकता है। लेकिन हम उसकी ओर कुछ भी कदम न उठाने के लिए तैयार हों, तो दुर्भाग्य ही है । ''स्वयं की शक्ति और समय का थोड़ा अंश सत्य के लिये, शांति के लिये, सौंदर्य के लिये, शुभ के लिये दो और फिर तुम देखोगे कि जीवन की ऊंचाइयां तुम्हारे निकट आती जा रही हैं। और, एक बिलकुल अभिनव जगत अपने द्वार खोल रहा है, जिसमें कि बहुत आध्यात्मिक शक्तियां अंतर्गर्भित हैं। सत्य और शांति की जो आकांक्षा करता है, वह क्रमश: पाता है कि सत्य और शांति उसके होते जा रही हैं। और, जो सौंदर्य और शुभ की ओर अनुप्रेरित होता है, वह पाता है कि उनका जन्म स्वयं उसके ही भीतर हो रहा है।''सुबह उठकर आकांक्षा करो कि आज का दिवस सत्य, शिव और सुंदर की दिशा में कोई फल ला सके। और, रात्रि देखो कि कल से तुम जीवन की ऊंचाइयों के ज्यादा निकट हुए हो या नहीं। गहरी आकांक्षा स्वयं में गहरी आकांक्षा पैदा करता है। (सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)***************************************
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प्रस्तुति -जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा ,भोपाल
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प्रस्तुति -जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा ,भोपाल
Friday, March 26, 2010
'' महत्व काम ''
स्त्री -पुरुषों के पास समय बिताने के लिए कोई काम न हो तो वे पतित हो जाते है । हमे काम मतलब श्रम से जी नहीं चुराना चाहिए अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे जिसका प्रक्रति के लिए कोई उपयोग नहीं होगा , '' फल हीन अंजीर '' की कथा याद करो जिसमे कहा गया था कि बिना काम स्त्री -पुरुष झगड़ालू , असंतुस्ट ,अधीर और चिडचिडे हो जाते है चाहे ऊपर से वे कितने ही मीठे और मिलनसार ही क्यों न दिखाई दें , जो यह शिकायत करे कि '' मेरे पास कोई काम नहीं है '' या '' मुझसे काम नहीं बनता '' उसे झगड़ालू और शिकायत से भरा हुआ समझना चाहिए , उसके चेहरे पर थकावट -सी छाई हुई होगी ...... उसका चेहरा देखने में भला न प्रतीत हो रहा होगा । कई लोग ऐसा सोचते है कि उनके पास काम नहीं है तो वे भाग्यवान है या उनसे काम नहीं बनता तो वे खुशहाल है यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि काम का न होना सौभाग्य या मनचाही वस्तु है । काम न करना एक तरह से प्रक्रति के विरुद्ध -विद्रोह है ,मनुष्यता का , या पौरुष का अपमान है , यह पुर्णतः अप्राक्र्तिक और लोकिक नियमो के विपरीत है ..... अपनी रोजी -रोटी के लिए thodee कमाई कर के अपने अन्दर अहं पल लेना ......बाल -बच्चे पैदा कर के घर चला लेना क्या इतना ही पर्याप्त है इस जीवन के लिए ........ सोचो तो जरा ...... अरे भाई कुछ काम करो । कुछ काम करो .... जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ कुछ व्यर्थ न हो ............ । तो कुछ तो ऐसा 'काम' कर लो जिससे पूरे विश्व के उत्थान का रास्ता प्रसस्त हो.... जिस दिन इस धरती पर श्रम और काम की कीमत गिर जायेगी उस दिन यहाँ की सारी चहल -पहल और खुशियाली मिटटी में मिल जायेगी ... अतः हमें अपने काम और श्रम के द्वारा इस संसार को बहुत सुन्दर बनाना है काम ... काम ॥और श्रम ही वास्तव में असली देवता है ।
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-जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल
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-जय प्रकाश पाण्डेय
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