Tuesday, April 20, 2010

'' सहजता , सरलता, सम्पन्नता ''

तीजन बाई को सब जानते हैं। लोग कहते-लिखते हैं तीजन बाई बहुत बड़ी इंटरनेशनल फेम लोक कलाकार है। पंडवानी पर अपनी विशेष अदायगी के लिए वे पदमश्री से भी नवाजी जा चुकी हैं, पर तीजन बाई को अपनी उपलब्धियों का जरा सा भी गुरूर नहीं है। अपने बारे में, अपनी कला के बारे में और अपने देस के बारे में वे क्या सोचती हैं, जानिए उन्हीं की जुबानी…

ईमानदारी से कहूं मैं आज भी गांव की औरत हूं। सब काम करती हूं। सब्जी बनाती हूं। चटनी बनाती हूं। धान मिंजाई व ओसाई भी कर लेती हूं। आप अपने मन ही बतावो मैं कहां से बड़ी हूं। मेरे दिल में कुछ नहीं है …ऊंच-नीच, गरीब-अमीर कुछ नहीं, मैं सभी से एक जैसे ही मिलती हूं। बात करती हूं। बच्चों बूढ़ों के बीच बैठ जाती हूं। इससे दुनियादारी की कुछ बातें सीखने तो मिलती है और अनुभव भी बाढ़थे। ऎसे में कोई कुछ-कह बोल भी दे तब भी बुरा नहीं लगता। खराब छपने का भी बुरा नहीं मानती। भोपाल के एक पत्रकार ने छापा था कि तीजनबाई डिस्को डांस के समान पंडवानी करती है, ओव्हर मेकअप करती है, ओव्हर पहनती है, वैसा लोक कलाकार को नहीं करना चाहिए। ऎसा बुरा छपने का भी बुरा नहीं लगा… पर सोचना चाहिए, आदिवासी औरतें आज भी कुछ नहीं पहनती, लुगरा पहनती हैं बिना बेलाउज के रहती है। बीड़ी फूंकती हैं, सुट्टा लगाती हैं… मैं भी पहले गांव में ऎसे ही रहती थी। लेकिन आज युग बदल गया है आज मैं जो पहन रही हूँ वह कैसे ओव्हर हो गया सलवार सूट भी तो मैंने नहीं पहनी, न पहलूंगी, साड़ी-पोलखा पहनती हूं। मेकअप का ये सामान देखो, इसमें क्या, पाउडर- क्रीम और बोरोलीन ही तो है क्या ये फुल मेकअप है! मैं पूछती हूं क्या काजर लगाना, टिकली-माहूर सजाना, मांग में सिंदूर भरना, बारों महीना हाथ पर चूडी़ पहरना कैसे ओव्हर है भाइ! मैं आज भी एक टेम बोरे बासी (रात में पका चावल पानी में डालकर) और टमामर की चटनी खाती हूं।
मेरे घर में एक टेम सभी बासी खाते हैं। लोग पूछते-बोलते हैं, तीजनबाई कुछ नाश्ता किया करो तो मैं बोलती हूँ आप अपने मन का नाश्ता करते हो तो मैं बासी क्यों नहीं खा सकती क् भई, बोरे-बासी छत्तीसगढ़ का अमृत है… जौउन ला खाके हम अन जितना काम कर सकते हैं उतना दूसरा भोजन या नाश्ता करके नहीं किया जा सकता। बासी के सामने शराब का नशा भी कुछ नहीं है।
बिदेस खूब घूम डाली हूं, पर अपना देस अलग है वहाँ एक टाइप की कला है यहां विविध कलाएं हैं। मैं धार्मिक सिनेमा को छोड़कर दूसरा कोई सिनेमा भी नहीं देखती, किसी हीरो-हीरोइन को भी नहीं जानती। बचपन में जब दो रोटी भी घर में नहीं थी फिल्म कहां से देखती। पदमश्री मिलने का दिन आज भी मोर सुरता में है, वेंकटरमनजी ने दिया था। उसी दिन इंदिरा गांधी से भी मिली थी बहुत अच्छी लगी, उन्होंने मेरी पंडवानी सुनी थी। मुझे बुलाकर बोली- छत्तीसगढ़ की हो ना। मैने हाँ कहा तो इंदिरा बोली महाभारत करती हो तो मैं बोली पंडवानी सुनाती हूं महाभारत नहीं कराती, सुनकर इंदिराजी खुश हुई और मेरी पीठ थपथपाई थीं।
युग बदल गया तो मैं भी बदल गई लेकिन इतनी नहीं बदली कि लोग अंगुली उठाएं। मैं जो पहनती हूं वही पूरा छत्तीसगढ़ है, अऊ मोर छत्तीसगढ़ के ये श्रृंगार है। यह बुरा कैसे हो सकता है। रही बात डिस्को की, मैं कभी डिस्को नहीं देखती। किसी स्कूल के प्रोग्राम में चीफ गेस्ट बना देते हैं तो देखती हूं छोटे-छोटे लइका लइकी को डिस्को करते, बच्चों का डिस्को करना अच्छा लगता है पर हमारी लोककला में जो बात है वह बिदेशी नाच-गाना में नही। बिदेशी नाच में कमर जरूर हिलबे , अऊ हमार लोककला में दिल हिलबेे। लोककला के बारे में कछू कहना-लिखना आसान है। लेकिन, एला बचाने में बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। अब मेरी अपनी ही बात बताऊं पंडवानी में करांति आ गई है फिर भी मेरे अपने घर में मेरी लोककला का कोई का बस में नहीं है। अच्छी-खासी फौज है बहू-बेटा, नाती पोतों की, पर कोई भी पंडवानी से जुड़ा नहीं है। इसका मुझे कोई दुख भी नहीं है। बाहर कोई कलाकार तो होगा उसे तैयार करूंगी और अपनी कला देकर जाऊंगी, जिसमें प्रतिभा होगी। मेरे बच्चे आज वो सब कर रहे हैं जो मैं नहीं कर पाई यानी मैं एक किलास (क्लास) भी नहीं पढ़ पाई। पढ़ाई न करने का कोई दुख भी नहीं है। हो सकता है पढ़-लिख लेती तो शायद लोककला से नहीं जुड़ पाती।

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प्रस्तुति -जय प्रकाश पाण्डेय

माइक्रो फाइनेंस शाखा , भोपाल

Monday, April 19, 2010

Name -- Teejan Bai
Age -- 38 years
Children- One daughter and one son
Block(Distt.)- Indore
Current Loan- Rs 25000/
Business- Grocery store owner,local milk trading,

As a child , Teejan Bai was unable to attend school, due to financial burden of school fees. At a very young age she was married to santosh singh and since then she and her husband struggled day and night to earn their livelihood. Teejan Bai stitched clothes and earned Rs 40/ per day on the day that she had customers. Her husband operated an unsuccessful grocery store that providedthem with Rs 20/per day.

They always wanted that their children should study but the barely survived, and hence the desire of sending the children to school was only like a dream for the couple. Teejan Bai joined self help group in her village. She did not want her children's life to follow the same path as her life. She invested her first loan Rs 2000/ in purchasing swing machine, after successful loan repayment to NGO APARAJITA MAHILA SAKH SAH. MYDT INDORE she took another loan for the family grocery stor and purchased new stock of the store, which helped their business . State Bank Of India MICRO FINANCE BRANCH BHOPAL sanctioned a loan of Rs 47 lacs to Aparajita Mahila Sakh sAH. mYDT for on-landing to SHGs . Then Aparajita sanctioned a loan to Teejan Bai for upliftment of her business .with third loan of Rs 15000/ she was able to further diversify their stock and increase their profits.

This increase in profit made possible for them to buy a refrigerator to store soft drink and other cold items. This made their store very popular and now they have one of most successful businesesn in that village.She has invested a large portion of their profit in their daughter's education. She is now studing in 9th grade in district school and staying in a hostel. Teejan Bai wanted that she should continue to study and become Doctor, she doesnot want the financial crisis that prevented her from attending school to stop her daugther from continuing her education. Teejan Bai works hard at making her grocery store a success in order to provide her daughter with the schooling.

Then Teejan Bai took two subsequent loans of Rs 25000/ and Rs 35000/ for purchase of buffaloes, not only she herself is now self-employed but she also provided employment to her husband. Her husband now collects milk from small procedure in the village and sales it in the block headquarters.

Teejan Bai now planning to take another a big loan after completion of current loan for purchase of tent house as their village does not have any tent house for organizing marriages and ceremonies. Teejan Bai is grateful to State Bank Of India MICRO FINANCE BRANCH BHOPAL for helping her in time of need by lending her collateral free money. She says the support that Micro Finance Branch has provided to her created abetter future for her family.
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-JAI PRAKASH PANDEY
MICRO FINANCE BRANCH,
BHOPAL
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Sunday, March 28, 2010

'' कविता इसलिए ''

इस कविता में सूरज इसलिए ,
ताकि ' सुबह ' का एहसास रहे ,
इस कविता में ख्वाब इसलिए ,
ताकि उम्मीद का सिलसिला बने ,
इस कविता में 'याद' इसलिए ,
ताकि जीवन में रोमांच मिले ,
इस कविता में ' आग ' इसलिए ,
ताकि सबको परम सुख मिले ,
इस कविता में 'आवाज ' इसलिए ,
ताकि जागते रहो की मुनादी मिले ,
इस कविता में संतोष इसलिए ,
ताकि सबको भरपूर सुख मिले ,
इस कविता में सिटिजन इसलिए ,
ताकि सच्चे अच्छे को अधिकार मिले ,
इस कविता में ''ओबामा ''इसलिए ,
ताकि 'परिवर्तन ' की याद रहे ,

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--जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

Saturday, March 27, 2010

'' सवालों के तूफान ''

चार माह पहले झाबुआ से वापस लोटते समय धार के पास आगे -आगे भाग रहे ट्रक के पीछे लिखा था ,
'' कृष्ण करें तो खेल ,
हम करें तो जेल ,''

ट्रक पर लिखे इन शब्दों की पीड़ा को लाखों ने झेला होगा /झेल रहे होंगे , पर अब चिंता की बात नहीं ....
सुप्रीम कोर्ट ने अपने नए फेसले ''लिव इन रिलेशनशिप '' में ट्रक में लिखे शब्दों की पीड़ा में सबको राहत
दे दी है , अब ' कृष्ण और हम सब'' एक हो गए है ,

-जय प्रकाश पाण्डेय

'' पहल -सिटिजनशिप ''

जीवन है चलने का नाम ..... जो लोंग परेशानी भरी जिंदिगी जीते है उनकी संवेदनाये मरती नहीं है , उनकी संवेदना विपरीत परिस्थतियों से लड़ने की प्रेरणा देती है और वे अन्य के लिए भी प्रेरक बन जाते है , उनकी सहज सरल बातें भी ख़ुशी का पैगाम बनकर उस माहौल में संवेदना , सेवा और सामाजिकता पैदा कर देती है , नारायणगंज शाखा में दूर - अंचल से खाता खोलने आये ''रंगेया'' ने भी कुछ ऐसी छाप छोडी ........
''रंगेया '' जब खाता खोलने आया तो बेंकवाले ने पूछा - ''रंगेया '' खाता क्यों खुलवा रहे हो ?
''रंगेया '' ने बताया - साब दस कोस दूर बियाबान जंगल के बीच हमरो गाँव है घास -फूस की टपरिया और घरमे दो-दो बछिया ....घर की परछी में एक रात परिवार के साथ सो रहे थे तो कालो नाग आके घरवाली को डस लियो , रात भर तड़फ -तडफ कर बेचारी रुकमनी मर गई ...... मरते दम तक भुखी प्यासी दोनों बेटियों की चिंता करती रही ........ सांप के काटने से घरवाली मरी तो सरकार ने ये पचास हजार रूपये का चेक दिया है , तह्सीलवाला बाबु बोलो कि बैंक में खाता खोलकर चेक जमा कर देना रूपये मिल जायेगे ..... सो खाता की जरूरत आन पडी साब ! .... बैंक वाले ने पूछा - सांप ने काटा तो शहर ले जाकर इलाज क्यों नहीं कराया ?
''रंगेया '' बोला - कहाँ साब !'' गरीबी में आटा गीला ''.... शहर के डॉक्टर तो गरीब की गरीबी से भी सौदा कर लेते है ,वो तो भला हो सांप का ... कि उसने हमारी गरीबी की परवाह की और रुकमनी पर दया करके चुपके से काट दियो , तभी तो जे पचास हजार मिले है खाता न खुलेगा ...... तो जे भी गए ............ अब जे पचास हजार मिले है तो कम से कम हमारी गरीबी तो दूर हो जायेगी , दोनों बेटियों की शादी हो जयेहे और घर को छप्पर भी सुधर जाहे ,जे पचास हजार में से तहसील के बाबु को भी पांच हजार देने है बेचारे ने इसी शर्त पर जे चेक दियो है । तभी किसी ने कहा -यदि नहीं दो तो ?........... रंगेया तुरंत बोला - नहीं साब ...... हम गरीब लोंग है ''प्राण जाय पर वचन न जाही '' ...साब , यदि नहीं दूगा तो मुझे पाप लगेगा , उस से वायदा किया हूँ झूठा साबित हो जाऊँगा ....अपने आप की नजर में गिर जाऊँगा .....gareeb तो हूँ और गरीब हो जाऊँगा .......और फिर दूसरी बात जे भी है कि जब किसी गरीब को सांप कटेगा ,तो ये तहसील बाबु उसके घर वाले को फिर चेक नहीं देगा .......... रंगेया की बातों ने पूरे बैंक हाल में सिटिजनशिप का माहौल बना दिया ............ सब तरफ से आवाजे हुई .... पहले रंगेया का काम करो , भीड़ को चीरता हुआ मैंने जाकर रंगेया के हाथों सौ रूपये वाले नए पांच के पेकेट रख दिए ....... उसी पल रंगेया के चेहरे पर ख़ुशी के जो भाव प्रगट हुए वो जवां से बताये नहीं जा सकते ...... बस इतना ही बता सकते है कि पूरे हाल में खुशियों की phuljhhadiyan जरूर जल उठीं ...... हाल में खड़े लोंग कह उठे .... कि खुशियाँ हमारे आस -पास ही छुपी होती है यदि हम उनकी परवाह करे तो वे कहीं भी मिल सकती है ...........
जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल

'' चुटका की चुटकी ''

हेड आफिस से रोज पत्र मिल रहे थे ,....... रिकवरी हेतु भारी भरकम टार्गेट दिया गया था । कहते है - '' वसूली केम्प गाँव -गाँव में लगाएं, तहसीलदार के दस्तखत वाला वसूली नोटिस भेजें ..... कुर्की करवाएं ......और दिन -रात वसूली हेतु गाँव-गाँव के चक्कर लगाएं , ... हर वीक वसूली के फिगर भेजें ,.... और 'रिकवरी -प्रयास ' के नित -नए तरीके आजमाएँ .......... । बड़े साहब टूर में जब-जब आते है ..... तो कहते है -'' तुम्हारे एरिया में २६ गाँव है , और रिकविरी फिगर २६ रूपये भी नहीं है , धमकी जैसे देते है .......कुछ नहीं सुनते है , कहते है - की पूरे देश में सूखा है ... पूरे देश में ओले पड़े है ..... पूरे देश में गरीबी है ......हर जगह बीमारी है पर हर तरफ से वसूली के अच्छे आंकड़े मिल रहे है और आप बहानेबाजी के आंकड़े पस्तुत कर रहे है , कह रहे है की आदिवासी इलाका है गरीबी खूब है .............कुल मिलाकर आप लगता है की प्रयास ही नहीं कर रहे है .......आखें तरेर कर न जाने क्या -क्या धमकी ......... । तो उसको समझ में यही आया की वसूली हेतु बहुत प्रेशर है और अब कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा ........ सो उसने चपरासी से वसूली से संबधित सभी रजिस्टर निकलवाये , ..... नोटिस बनवाये ...कोटवारों और सरपंचों की बैठक बुलाकर बैंक की चिंता बताई । बैठक में शहर से मग्वाया हुआ रसीला -मीठा , कुरकुरे नमकीन , 'फास्ट-फ़ूड ' आदि का भरपूर इंतजाम करवाया ताकि सरपंच एवम कोटवार खुश हो जाएँ ... बैठक में उसने निवेदन किया की अपने इलाका का रिकवरी का फिगर बहुत ख़राब है कृपया मदद करवाएं , बैठक में दो पार्टी के सरपंच थे ...आपसी -बहस ....थोड़ी खुचड़ और विरोध तो होना ही था , सभी का कहना था की पूरे २६ गाँव जंगलों के पथरीले इलाके के आदिवासी गरीब गाँव है ,घर -घर में गरीबी पसरी है फसलों को ओलों की मर पडी है ...मलेरिया बुखार ने गाँव-गाँव में डेरा दल रखा है ,..... जान बचाने के चक्कर में सब पैसे डॉक्टर और दवाई की दुकान में जा रहा है ....ऐसे में किसान मजदूर कहाँ से पैसे लायें ... चुनाव भी आस पास नहीं है ......... सब ने खाया पिया और ''जय राम जी की '' कह के चल दिए और हम देखते ही रह गए ....... । दूसरे दिन उसने सोचा -सबने डट के खाया पिया है तो खये पिए का कुछ तो असर होगा ,थोड़ी बहुत वसूली तो आयेगी ........ यदि हर गाँव से एक आदमी भी हर वीक आया तो महीने भर में करीब १०४ लोगों से वसूली तो आयेगी ऐसा सोचते हुए वह रोमांचित हो गया ..... उसने अपने आपको शाबासी दी ,और उत्साहित होकर उसने मोटर सायकिल निकाली और ''रिकवरी प्रयास '' हेतु वह चल पड़ा गाँव की ओर ............ जंगल के कंकड़ पत्थरों से टकराती ..... घाट-हट चद्ती उतरती ... टेडी-मीडी पगडंडियों में भूली भटकती मोटर साईकिल किसी तरह पहुची एक गाँव तक ......... । सोचा कोई जाना पहचाना चेहरा दिखेगा तो रोब मारते हुए '' रिकवरी धमकी '' दे मारूंगा , सो मोटर साईकिल रोक कर वह थोडा देर खड़ा रहा , फिर गली के ओर-छोर तक चक्कर लगाया ............. वसूली रजिस्टर निकलकर नाम पड़े ............ कुछ बुदबुदाया .......उसे साहब की याद आयी .....फिर गरीबी को उसने गली बकी.........पलट कर फिर इधर-उधर देखा ........कोई नहीं दिखा । गाँव की गलियों में अजीब तरह का सन्नाटा और डरावनी खामोशी फेली पडी थी , कोई दूर दूर तक नहीं दिख रहा था , ............ ।कोई नहीं दिखा तो सामने वाले घर में खांसते खखारते हुए वह घुस गया ,अन्दर जा कर उसने देखा ....दस-बारह साल की लडकी आँगन के चूल्हे में रोटी पका रही है , रोटी पकाते निरीह ...... अनगद हाथ और अधपकी रोटी पर नजर पड़ते ही उसने '' रिकवरी धमकी '' स्टाइल में लडकी को दम दी ....... ऐ लडकी ! तुमने रोटी तवे पर एक ही तरफ सेंकी है , कच्ची रह जायेगी ? ................ लडकी के हाथ रुक गए ,...पलट कर देखा , सहमी सहमी सी बोल उठी ............ बाबूजी रोटी दोनों तरफ सेंकती तो जल्दी पक जायेगी और ....... जल्दी पच जायेगी ....फिर और आटा कहाँ से पाएंगे .....?वह अपराध बोध से भर गया ...... ऑंखें नम होती देख उसने लडकी के हाथ में आटा खरीदने के लिए १००/ का नोट पकडाया ... और मोटर सायकिल चालू कर वापस बैंक की तरफ चल पड़ा ................. (--जय प्रकाश पाण्डेय , मायक्रो फायनेंस शाखा , भोपाल )

'' आत्म -गहराई ''

सुबह कुछ लोग आए थे। उनसे मैंने कहा, ''सदा स्वयं के भीतर गहरे से गहरे होने का प्रयास करते रहो। भीतर इतनी गहराई हो कि कोई तुम्हारी थाह न ले सके। अथाह जिसकी गहराई है, अगोचर उसकी ऊंचाई हो जाती है।''जीवन जितना ही ऊंचा हो जाता है, जितना कि गहरा हो। जो ऊंचा तो होना चाहते हैं, लेकिन गहरे नहीं, उनकी असफलता सुनिश्चित है। गहराई के आधार पर ही ऊंचाई के शिखर संभलते हैं। दूसरा और कोई रास्ता नहीं। गहराई असली चीज है। उसे जो पा लेता है, उन्हें ऊंचाई तो अनायास ही मिल जाती है।
सागर से जो स्वयं में गहरे होते हैं, हिम शिखरों की ऊंचाई केवल उन्हें ही मिलती है। गहराई मूल्य है, जो ऊंचा होने के लिए चुकाना ही पड़ता है। और, स्मरण रहे कि जीवन में बिना मूल्य कुछ भी नहीं मिलता है।स्वामी राम कहा करते थे कि उन्होंने जापान में तीन-तीन सौ, चार-चार सौ साल के चीड़ और देवदार के दरख्त देखे, जो केवल एक-एक बालिश्त के बराबर ऊंचे थे!
आप ख्याल करें कि देवदार के दरख्त कितने बड़े होते हैं! मगर कौन और कैसे इन दरख्तों को बढ़ाने से रोक देता है? जब उन्होंने दर्याफ्त किया, तो लोगों ने कहा हम इन दरख्तों के पत्तों और टहनियों को बिलकुल नहीं छेड़ते, बल्कि जड़ें काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और, कायदा है कि जब जड़ें नीचे नहीं जाएंगी, तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे दोनों में इस किस्म का संबंध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अपनी आत्मा में जड़े बढ़ानी चाहिए। भीतर जड़े नहीं बढ़ेंगी, तो जीवन कभी ऊपर नहीं उठ सकता है।
लेकिन, हम इस सूत्र को भूल गए हैं और परिणाम में जो जीवन देवदार के दरख्तों की भांति ऊंचे हो सकते थे, वे जमीन से बालिश्त भर ऊंचे नहीं उठ पाते हैं! मनुष्य छोटे से छोटा होता जा रहा है, क्योंकि स्वयं की आत्मा में उसकी जड़ें कम से कम गहरी होती जाती हैं।शरीर सतह है, आत्मा गहराई। शरीर में जो जीता है, वह गहरा कैसे हो सकेगा? शरीर में नहीं, आत्मा में जीओ। सदैव यह स्मरण रखो कि मैं जो भी सोचूं, बोलूं और करूं, उसकी परिसमाप्ति शरीर पर ही न हो जावे। शरीर से भिन्न और ऊपर भी कुछ सोचो, बोलो और करो। उससे ही क्रमश: आत्मा में जड़े मिलती हैं और गहराई उपलब्ध होती है।
(सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन )
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*जय प्रकाश पाण्डेय
माइक्रो फाइनेंस शाखा
भोपाल